Social Issues in India

Bharat ke Samajik Mudde in Hindi – Social Issues in India

Social Issues

Bharat ke Samajik Mudde in Hindi – Social Issues in India

Social Issues

 

परिचय: सामाजिक मुद्दों (भी सामाजिक समस्या, सामाजिक बुराई, और सामाजिक संघर्ष) कि अवांछनीय शर्त यह है कि या तो पूरे समाज द्वारा या समाज के एक वर्ग द्वारा विरोध किया है। यह एक अवांछित सामाजिक स्थिति है, जो समाज के लिए हानिकारक है।

भारत में इस तरह जाति व्यवस्था, बाल श्रम, अशिक्षा, लिंग असमानता, अंधविश्वास, धार्मिक संघर्ष, और कई और अधिक के रूप में सामाजिक मुद्दों की एक बड़ी संख्या का सामना करना पड़ रहा है। यह उच्च समय इन अवांछनीय सामाजिक बुराइयों से राहत पाने के लिए है।

प्रमुख सामाजिक मुद्दे ( Social Issues ): हमने भारत में प्रमुख सामाजिक मुद्दों की एक सूची तैयार की है। वे संक्षेप में निम्न क्रम में नीचे चर्चा कर रहे हैं:

  • जाति व्यवस्था
  • गरीबी
  • बाल श्रम
  • बाल विवाह
  • निरक्षरता
  • महिलाओं की कम स्थिति
  • काम पर लिंग असमानता
  • दहेज प्रथा
  • सती प्रथा
  • शराबखोरी
  • अंधविश्वास
  • स्वच्छता और साफ-सफाई
  • धार्मिक संघर्ष
  • भिक्षावृत्ति
  • बाल अपराध

 

जाति व्यवस्था as Social Issues

परिचय: जाति व्यवस्था जन्म के समय से व्यक्तियों के लिए वर्ग को परिभाषित करने या स्थिति बताए की एक प्रणाली है। भारत में जाति व्यवस्था मुख्य रूप से पेशे आधारित है। भारत सदियों से जाति व्यवस्था का शिकार हुआ है।

 

कारण, प्रभाव और भारत में जाति व्यवस्था के समाधान के नीचे चर्चा कर रहे हैं: 

कारण: भारत में जाति व्यवस्था के विकास के पीछे मुख्य कारण काम विशेषज्ञता के आधार पर जाति का काम है। वहाँ समाज में नौकरियों जो लोगों को अपनी क्षमता के आधार पर दिया गया था के विभिन्न प्रकार के थे। विशेषज्ञता के आधार पर नौकरी के इस विभाजन जाति व्यवस्था में हुई।

 

जाति व्यवस्था के चार वर्ग:

  1. ब्राह्मणों पुरोहित वर्ग। वे मुख्य रूप से धार्मिक और पुरोहित की गतिविधियों में लगे हुए थे। उन्होंने किंग्स के लिए सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया था।
  2. क्षत्रिय योद्धा और शासक वर्ग। वे मुख्य रूप से युद्ध की गतिविधियों में लगे हुए थे।
  3. वैश्यव्यापारी वर्ग। वे मुख्य रूप से व्यापार, कृषि, और व्यापारिक गतिविधियों में लगे हुए थे।
  4. शूद्रोंचार पारंपरिक वर्ग की सबसे कम घरेलू नौकरों और मजदूर, आदि के रूप में लगे हुए

 

जाति व्यवस्था के नकारात्मक प्रभाव: जाति व्यवस्था के कई नुकसान है:

  • अस्पृश्यता को प्रोत्साहित
  • बढ़ावा असमानता
  • प्रकृति में अलोकतांत्रिक
  • श्रेष्ठता और हीनता में नकली भेदभाव।
  • ऊपरी और निचले जाति के लोगों के बीच की खाई बढ़ जाती है।

जाति व्यवस्था भी देश के राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में एक खतरा है। जाति व्यवस्था इस तरह की अस्पृश्यता, बाल विवाह, सती प्रणाली, वेश्यावृत्ति, आदि के रूप में कई अमानवीय और अनैतिक सामाजिक प्रथाओं के लिए एक प्रमुख कारण है

 

उपाय:

  • शिक्षा को बढ़ावा! को बढ़ावा इस से नुकसान के बारे में पता लगेगा ।
  • मानव-प्राणियों की समानता के पक्ष में बड़े पैमाने पर सामाजिक बदलाव की जरूरत है।
  • जाति व्यवस्था ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक शिक्षा के माध्यम से हतोत्साहित किया जा सकता है।
  • वहाँ स्कूलों में विशेष कक्षाएं से बच्चों के लिए मूल्य और नैतिक शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
  • बेहतर शिक्षा और आर्थिक प्रगति के साथ, विविध जाति के लोगों का मिश्रण हो!

 

गरीबी as Social Issues

परिचयनिर्धनता एक परिस्थिति है जिसमें लोग जीवन के आधारभूत जरुरतों से महरुम रहते हैं जैसे अपर्याप्त भोजन, कपड़े और छत। भारत में ज्यादातर लोग ठीक ढंग से दो वक्त की रोटी नही हासिल कर सकते, वो सड़क किनारे सोते हैं और गंदे कपड़े पहनते हैं। वो उचित स्वस्थ पोषण, दवा और दूसरी जरुरी चीजें नहीं पाते हैं। शहरी जनसंख्या में बढ़ौतरी के कारण शहरी भारत में गरीबी बढ़ी है क्योंकि नौकरी और धन संबंधी क्रियाओं के लिये ग्रामीण क्षेत्रों से लोग शहरों और नगरों की ओर पलायन कर रहें है। लगभग 8 करोड़ लोगों की आय गरीबी रेखा से नीचे है और 4.5 करोड़ शहरी लोग सीमारेखा पर हैं। झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले अधिकतर लोग अशिक्षित होते हैं। कुछ कदमों के उठाये जाने के बावजूद गरीबी को घटाने के संदर्भ में कोई भी संतोषजनक परिणाम नहीं दिखाई देता है।

 

कारण, प्रभाव और भारत में गरीबी के लिए समाधान नीचे चर्चा कर रहे हैं:

कारण:

  • लोगों को उचित शिक्षा जो गरीबी की ओर जाता है नहीं मिलता है। लोग गरीब हैं क्योंकि वे अनपढ़ हैं, और वे अनपढ़ हैं, क्योंकि वे शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर सकते।
  • इस मामले में जहां संसाधन और अवसर सीमित हैं और जनसंख्या अधिक है, वहाँ बेरोजगारी की एक स्थिति है जो अंतत: गरीबी की ओर जाता है।
  • लोगों की एक बड़ी संख्या गरीबी में रहते हैं, वहाँ देश की अर्थव्यवस्था के विकास के लिए सीमित गुंजाइश है।
  • वर्षा की कमी, सूखा, के रूप में कुछ प्राकृतिक और पर्यावरण संबंधी समस्याओं अक्सर गरीबी पैदा करती है। वहाँ भी जाति व्यवस्था, बेरोजगारी, आदि जैसे कई अन्य कारण हैं 

 

प्रभाव:

  • गरीब लोगों को हमेशा जीवित रहने के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ेगा।
  • कम गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ बुरा पोषण होता है।
  • गरीब लोग पेशे के चुनाव के लिए कम स्वतंत्रता है।
  • गरीबी चरम कठिनाई में रहने वाले लोगों के नैतिक और आत्मसम्मान को प्रभावित कर सकता है।
  • गरीबी भी तनाव है जो अंततः लोगों के रिश्ते को प्रभावित करता है।

 

समाधान:  गरीबी के समाधान के लिए नीचे चर्चा कर रहे हैं:

  • गरीबी रोजगार के अवसर बढ़ाने के द्वारा जाँच की जा सकती है।
  • सरकार दान, ट्रस्टों के प्रति और अधिक कदम उठाने और जब उन सामाजिक संस्थाओं में पैसा खर्च करने के कुछ पारदर्शिता होनी चाहिए।
  • श्रमिकों को भुगतान किया छुट्टी का पहल के लिए एक की जरूरत है।
  • शिक्षा प्रणाली में सुधार किया जाना चाहिए और पहल स्कूलों के लिए अधिक बच्चों को लाने के लिए लिया जाना चाहिए।

बाल श्रम Social Issues

परिचय: बाल-श्रम का मतलब ऐसे कार्य से है जिसमे की कार्य करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा से छोटा होता है। इस प्रथा को कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संघटनों ने शोषित करने वाली माना है। अतीत में बाल श्रम का कई प्रकार से उपयोग किया जाता था, लेकिन सार्वभौमिक स्कूली शिक्षा के साथ औद्योगीकरण, काम करने की स्थिति में परिवर्तन तथा कामगारों श्रम अधिकार और बच्चों अधिकार की अवधारणाओं के चलते इसमे जनविवाद प्रवेश कर गया। बाल श्रम अभी भी कुछ देशों में आम है।

बाल विवाह

परिचय: संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, भारत बाल विवाह के मामले में दूसरे स्थान पर है। एक राष्ट्र जो अगली महाशक्ति के रुप में उभरता हुआ माना जा रहा है, उसके लिये ये एक परेशान करने वाली वास्तविकता है कि बाल विवाह जैसी बुराई अभी भी जारी है। शादी को दो परिपक्व (बालिग) व्यक्तियों की आपसी सहमति से बना पवित्र मिलन माना जाता है जो पूरे जीवनभर के लिये एक-दूसरे की सभी जिम्मेदारियों को स्वीकार करने के लिये तैयार होते हैं। इस सन्दर्भ के संबंध में, बाल विवाह का होना एक अनुचित रिवाज माना जाता है। तथ्य ये स्पष्ट करते हैं कि भारत में ये अभी भी प्रचलन में है इस व्याख्यित तथ्य के साथ कि इस बुराई को पूरी तरह से जड़ से उखाड़ना बहुत ही कठिन कार्य है।

निरक्षरता Social Issues

निरक्षरता का सामान्य अर्थ है: अक्षरों की पहचान तक न होना । निरक्षर व्यक्ति के लिए तो ‘काला अक्षर भैंस बराबर’ होता है । जो व्यक्ति पढ़ना-लिखना एकदम नहीं जानता, अपना नाम तक नहीं पढ़-लिख सकता, सामने लिखी संख्या तक को नहीं पहचान सकता है उसे निरक्षर कहा जाता है ।

निरक्षर व्यक्ति न तो संसार को जान सकता है और न ही अपने साथ होने वाले लिखित व्यवहार को समझ सकता है, इसीलिए निरक्षरता को अभिशाप माना जाता है । आज के अर्थात् इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करने वाले ज्ञान-विज्ञान के इस प्रगतिशील युग में भी कोई व्यक्ति या देश निरक्षर हो तो इसे एक त्रासदी के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता परन्तु यह तथ्य सत्य है कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा का विस्तार हो जाने पर भी भारत में निरक्षरों तथा अनपढों की बहुत अधिक संख्या है ।

इस बात को भली-भांति जानते हुए कि निरक्षर व्यक्ति को तरह-तरह की हानियां उठानी पड़ती हैं, उन्हें कई तरह की विषमताओं का शिकार होना पड़ता है, वे लोग साक्षर बनने का प्रयास नहीं करते हैं । यदि हम प्रगति तथा विकास-कार्यों से प्राप्त हो सकने वाले सकल लाभ को प्राप्त करना चाहते हैं तो हम सबको साक्षर बनना होगा अर्थात् निरक्षरता को समाप्त करना होगा ।

व्यक्तिगत स्तर पर भी निरक्षर व्यक्ति को कई तरह के कष्टों का सामना करना पड़ता है । वह न तो किसी को स्वयं कुशल-क्षेम जानने वाला पत्र ही लिख सकता है और न ही किसी से प्राप्त पत्र को पढ़ ही सकता है । निरक्षर व्यक्ति न तो कहीं मनीआर्डर भेज सकता है और न ही कहीं से आया मनीआर्डर अपने हस्ताक्षरों से प्राप्त कर सकता है, ऐसी दोनों स्थितियों में वह ठगा जा सकता है।

देहाती निरक्षरों से तो अंगूठे लगवाकर जमींदार व महाजन उनकी जमीनों के टुकड़े तक हड़प कर चुके हैं । ऐसा अनेक बार होता देखा गया है, इसीलिए निरक्षरता को अभिशाप माना जाता है । इस निरक्षरता के अभिशाप को मिटाने के लिए आजकल साक्षरता का अभियान जोर-शोर से चलाया जा रहा है।

महानगरों, नगरों, कस्बों व देहातों में लोगों को साक्षर बनाने के लिए अनेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं । अधिकतर निरक्षर लोग मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग होते हैं इसलिए उनके लिए सुबह-शाम घरों के पास पढ़ाई की व्यवस्था की जाती है।

गृहणियों के लिए दोपहर के खाली समय में पढ़-लिख पाने की मुफ्त व्यवस्था की जाती है । इनके लिए पुस्तक, कापी की भी मुफ्त व्यवस्था की जाती है । यहाँ तक कि घर-घर जाकर भी साक्षर बनाने के अभियान चलाये जा रहे हैं । इन सबसे लाभ उठाकर हम निरक्षरता के अभिशाप से मुक्ति पा सकते हैं । साक्षर होना या साक्षर बनाना आज के युग की विशेष आवश्यकता है।

 

महिलाओं की कम स्थिति as Social Issues

भारत में महिलाओं की स्थिति सदैव एक समान नही रही है। इसमें युगानुरूप परिवर्तन होते रहे हैं। उनकी स्थिति में वैदिक युग से लेकर आधुनिक काल तक अनेक उतार-चढ़ाव आते रहे हैं तथा उनके अधिकारों में तदनरूप बदलाव भी होते रहे हैं। वैदिक युग में स्त्रियों की स्थिति सुदृढ़ थी, परिवार तथा समाज में उन्हे सम्मान प्राप्त था। उनको शिक्षा का अधिकार प्राप्त था। सम्पत्ति में उनको बराबरी का हक था। सभा व समितियों में से स्वतंत्रतापूर्वक भाग लेती थी तथापि ऋगवेद में कुछ ऐसी उक्तियां भी हैं जो महिलाओं के विरोध में दिखाई पड़ती हैं। मैत्रयीसंहिता में स्त्री को झूठ का अवतार कहा गया है। ऋगवेद का कथन है कि स्त्रियों के साथ कोई मित्रता नही है, उनके हृदय भेड़ियों के हृदय हैं। ऋगवेद के अन्य कथन में स्त्रियों को दास की सेना का अस्त्र-शस्त्र कहा गया है। स्पष्ट है कि वैदिक काल में भी कहीं न कहीं स्त्रियाीं नीची दृष्टि से देखी जाती थीं। फिर भी हिन्दू जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वह समान रूप से आदर और प्रतिष्ठित थीं। शिक्षा, धर्म, व्यक्तित्व और सामाजिक विकास में उसका महान योगदान था। संस्थानिक रूप से स्त्रियों की अवनति उत्तर वैदिककाल से शुरू हुई। उन पर अनेक प्रकार के निर्योग्यताओं का आरोपण कर दिया गया। उनके लिए निन्दनीय शब्दों का प्रयोग होने लगा। उनकी स्वतंत्रता और उन्मुक्तता पर अनेक प्रकार के अंकुश लगाये जाने लगे। मध्यकाल में इनकी स्थिति और भी दयनीय हो गयी। पर्दा प्रथा इस सीमा तक बढ़ गई कि स्त्रियों के लिए कठोर एकान्त नियम बना दिए गये। शिक्षण की सुविधा पूर्णरूपेण समाप्त हो गई।

काम पर लिंग असमानता as Social Issues

हम 21वीं शताब्दी के भारतीय होने पर गर्व करते हैं जो एक बेटा पैदा होने पर खुशी का जश्न मनाते हैं और यदि एक बेटी का जन्म हो जाये तो शान्त हो जाते हैं यहाँ तक कि कोई भी जश्न नहीं मनाने का नियम बनाया गया हैं। लड़के के लिये इतना ज्यादा प्यार कि लड़कों के जन्म की चाह में हम प्राचीन काल से ही लड़कियों को जन्म के समय या जन्म से पहले ही मारते आ रहे हैं, यदि सौभाग्य से वो नहीं मारी जाती तो हम जीवनभर उनके साथ भेदभाव के अनेक तरीके ढूँढ लेते हैं। हांलाकि, हमारे धार्मिक विचार औरत को देवी का स्वरुप मानते हैं लेकिन हम उसे एक इंसान के रुप में पहचानने से ही मना कर देते हैं। हम देवी की पूजा करते हैं, पर लड़कियों का शोषण करते हैं। जहाँ तक कि महिलाओं के संबंध में हमारे दृष्टिकोण का सवाल हैं तो हम दोहरे-मानकों का एक ऐसा समाज हैं जहाँ हमारे विचार और उपदेश हमारे कार्यों से अलग हैं। चलों लिंग असमानता की घटना को समझने का प्रयास करते हैं और कुछ समाधानों खोजते हैं।

 

दहेज प्रथा as Social Issues

सामान्य दहेज उसे कहते है जो एक पुरुष तथा कन्या के शादी में कन्या के माँ बाप के द्वारा दिया जाता है लेकिन अब कलंकित कर रही है तथा वर पक्ष के लोग टी. वी., फ्रिज, कार इत्यादि की मांग कर रहे है यदि लड़की का बाप यह सब देने में असमर्थ हो तो लड़की की शादी रूक जाती है या शादी भी हो जाती है तो लडकी को तंग किया जाता है। 

 

सती प्रणाली (सती प्रथा) as Social Issues

परिचय: सती प्रथा प्रणाली या हमारे देश में प्रचलित, बुराई अमानवीय और अनैतिक सामाजिक प्रथाओं में से एक है। सती प्रणाली अपने पति की चिता पर विधवा महिलाओं द्वारा आत्महत्या करने का कार्य करने के लिए संदर्भित करता है। यह एक अमानवीय कृत्य है। 1987 में, रूप कंवर 18 वर्ष की आयु इस घटना के बाद से सती के लिए प्रतिबद्ध है, दोनों राज्य और केन्द्र सरकार अधिनियमित सती प्रणाली समाप्त करने का कार्य करता है।

 

शराबखोरी as Social Issues

शराबखोरी वह स्थिति है, जब व्यक्ति शराब का अत्यधिक सेवन करता है तथा शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से पीड़ित होने के बावजूद लगातार शराब पीता है। व्यक्ति के शराब पीने की आदत कई तरह की समस्याओं को पैदा करती है, लेकिन कई बार शारीरिक आदते समस्याओं को पैदा नहीं करती है।

यह समस्याएं शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक प्रभाव जैसे कि शराब विषाक्तता, यकृत (लीवर) की सिरोसिस, कार्य में असमर्थता और मेलजोल तथा विनाशकारी व्यवहार (हिंसा और बर्बरता) जैसी बहुत सारी हानिकारक स्थितियों को पैदा करती हैं।

 

अंधविश्वास as Social Issues

आदिम मनुष्य अनेक क्रियाओं और घटनाओं के कारणों को नहीं जान पाता था। वह अज्ञानवश समझता था कि इनके पीछे कोई अदृश्य शक्ति है। वर्षा, बिजली, रोग, भूकंप, वृक्षपात, विपत्ति आदि अज्ञात तथा अज्ञेय देव, भूत, प्रेत और पिशाचों के प्रकोप के परिणाम माने जाते थे। ज्ञान का प्रकाश हो जाने पर भी ऐसे विचार विलीन नहीं हुए, प्रत्युत ये अंधविश्वास माने जाने लगे। आदिकाल में मनुष्य का क्रिया क्षेत्र संकुचित था इसलिए अंधविश्वासों की संख्या भी अल्प थी। ज्यों ज्यों मनुष्य की क्रियाओं का विस्तार हुआ त्यों-त्यों अंधविश्वासों का जाल भी फैलता गया और इनके अनेक भेद-प्रभेद हो गए। अंधविश्वास सार्वदेशिक और सार्वकालिक हैं। विज्ञान के प्रकाश में भी ये छिपे रहते हैं। अभी तक इनका सर्वथा उच्द्वेद नहीं हुआ है। 

 

स्वच्छता और साफसफाई as Social Issues

स्वच्छता एक ऐसा कार्य नहीं है जो हमें दबाव में करना चाहिये। ये एक अच्छी आदत और स्वस्थ तरीका है हमारे अच्छे स्वस्थ जीवन के लिये। अच्छे स्वास्थ्य के लिये सभी प्रकार की स्वच्छता बहुत जरुरी है चाहे वो व्यक्तिगत हो, अपने आसपास की, पर्यावरण की, पालतु जानवरों की या काम करने की जगह  (स्कूल, कॉलेज आदि) हो। हम सभी को निहायत जागरुक होना चाहिये कि कैसे अपने रोजमर्रा के जीवन में स्वच्छता को बनाये रखना है। अपनी आदत में साफ-सफाई को शामिल करना बहुत आसान है। हमें स्वच्छता से कभी समझौता नहीं करना चाहिये, ये जीवन में पानी और खाने की तरह ही आवश्यक है। इसमें बचपन से ही कुशल होना चाहिये जिसकी शुरुआत केवल हर अभिभावक के द्वारा हो सकती है पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी है के रुप में। 

 

धार्मिक संघर्ष as Social Issues

भारत एक ऐसा देश है जहां धार्मिक विविधता और धार्मिक सहिष्णुता को कानून तथा समाज, दोनों द्वारा मान्यता प्रदान की गयी है। भारत के पूर्ण इतिहास के दौरान धर्म का यहां की संस्कृति में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। भारत विश्व की चार प्रमुख धार्मिक परम्पराओं का जन्मस्थान है – हिंदू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म तथा सिक्ख धर्म. बिश्नोई धर्म भारतीयों का एक विशाल बहुमत स्वयं को किसी न किसी धर्म से संबंधित अवश्य बताता है।

भारत की जनसंख्या के 76% लोग हिंदू धर्म का अनुसरण करते हैं। इस्लाम (13.5%), बौद्ध धर्म (5.5%), ईसाई धर्म (2.3%) और सिक्ख धर्म (1.9%), भारतीयों द्वारा अनुसरण किये जाने वाले अन्य प्रमुख धर्म हैं। आज भारत में मौजूद धार्मिक आस्थाओं की विविधता, यहां के स्थानीय धर्मों की मौजूदगी तथा उनकी उत्पत्ति के अतिरिक्त, व्यापारियों, यात्रियों, आप्रवासियों, यहां तक कि आक्रमणकारियों तथा विजेताओं द्वारा भी यहां लाए गए धर्मों को आत्मसात करने एवं उनके सामाजिक एकीकरण का परिणाम है। सभी धर्मों के प्रति हिंदू धर्म के आतिथ्य भाव के विषय में जॉन हार्डन लिखते हैं, “हालांकि, वर्तमान हिंदू धर्म की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसके द्वारा एक ऐसे गैर-हिंदू राज्य की स्थापना करना है जहां सभी धर्म समान हैं; …”

मौर्य साम्राज्य के समय तक भारत में दो प्रकार के दार्शनिक विचार प्रचलित थे, श्रमण धर्म तथा वैदिक धर्म. इन दोनों परम्पराओं का अस्तित्व हजारों वर्षों से साथ-साथ बना रहा है। बौद्ध धर्म और जैन धर्म श्रमण परंपराओं से निकल कर आये हैं, जबकि आधुनिक हिंदू धर्म वैदिक परंपरा का ही विस्तार है। साथ-साथ मौजूद रहने वाली ये परम्पराएं परस्पर प्रभावशाली रही हैं।

पारसी धर्म और यहूदी धर्म का भी भारत में काफी प्राचीन इतिहास रहा है और हजारों भारतीय इनका अनुसरण करते हैं। पारसी तथा बहाई धर्मों का पालन करने वाले विश्व के सर्वाधिक लोग भारत में ही रहते हैं। भारत की जनसंख्या के 0.2% लोग बहाई धर्म का पालन करते हैं।

भारत के संविधान में राष्ट्र को एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र घोषित किया गया है जिसमें प्रत्येक नागरिक को किसी भी धर्म या आस्था का स्वतंत्र रूप से पालन तथा प्रचार करने का अधिकार है (इन गतिविधियों पर नैतिकता, कानून व्यवस्था, आदि के अंतर्गत उचित प्रतिबंध लगाये जा सकते हैं). भारत के संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को एक मौलिक अधिकार की संज्ञा दी गयी है। 

 

भीख as Social Issues

हाल के सालों में भारत की आर्थिक विकास दर तेजी से बढ़ी है। लेकिन भिखारियों का मुद्दा अभी भी सबसे बड़ा है। भारत में गरीबी है लेकिन भीख संगठित रूप से मांगी जाती है। एरिया बंटा रहता है, कोई दूसरा उस क्षेत्र में भीख नहीं मांग सकता। हर भिखारी के ऊपर उसका सरगना होता है जोकि भीख में मिले पैसे में से एक हिस्सा लेता है।

हाल के सालों में भारत की आर्थिक विकास दर तेजी से बढ़ी है। लेकिन भिखारियों का मुद्दा अभी भी सबसे बड़ा है। भारत में गरीबी है लेकिन भीख संगठित रूप से मांगी जाती है। एरिया बंटा रहता है, कोई दूसरा उस क्षेत्र में भीख नहीं मांग सकता। हर भिखारी के ऊपर उसका सरगना होता है जोकि भीख में मिले पैसे में से एक हिस्सा लेता है।

इसीलिए भिखारियों को लेकर कोई भी अभियान सफल नहीं हो पाता है क्योंकि ऐसी आदत पड़ चुकी है कि कोई काम करना ही नहीं चाहता। कहते भी हैं कि जब बिना किसी काम धाम के सुबह से शाम तक हजार, दो हजार रुपये मिल जाते हैं तो काम कौन करे। काम करने पर इतना पैसा थोड़े ही मिलेगा। 

बाल अपराध as Social Issues

जब किसी बच्चें द्वारा कोई कानून-विरोधी या समाज विरोधी कार्य किया जाता है तो उसे किशोर अपराध या बाल अपराध कहते हैं। कानूनी दृष्टिकोण से बाल अपराध 8 वर्ष से अधिक तथा 16 वर्ष से कम आया के बालक द्वारा किया गया कानूनी विरोधी कार्य है जिसे कानूनी कार्यवाही के लिये बाल न्यायालय के समक्ष उपस्थित किया जाता है। भारत में बाल न्याय अधिनियम 1986 (संशोधित 2000) के अनुसर 16 वर्ष तक की आयु के लड़कों एवं 18 वर्ष तक की आयु की लड़कियों के अपराध करने पर बाल अपराधी की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है। बाल अपराध की अधिकतम आयु सीमा अलग-अलग राज्यों मे अलग-अलग है। इस आधार पर किसी भी राज्य द्वारा निर्धारित आयु सीमा के अन्तर्गत बालक द्वारा किया गया कानूनी विरोधी कार्य बाल अपराध है।

केवल आयु ही बाल अपराध को निर्धारित नहीं करती वरन् इसमें अपराध की गंभीरता भी महत्वपूर्ण पक्ष है। 7 से 16 वर्ष का लड़का तथा 7 से 18 वर्ष की लड़की द्वारा कोई भी ऐसा अपराध न किया गया हो जिसके लिए राज्य मृत्यु दण्ड अथवा आजीवन कारावास देता है जैसे हत्या, देशद्रोह, घातक आक्रमण आदि तो वह बाल अपराधी मानी जायेगा।

 

अतः हम सब को इस के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी

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