दलित समाज की समस्याओं को दिखाने में मीडिया की भूमिका – यह दलित पत्रकारिता का ही प्रभाव है कि आज किसी को चमार, भंगी, कुम्हार, चांडाल जैसे शब्दों से संबोधित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इन शब्दों को समाज विरोधी, आपराधिक, जनविरोधी और अमाननीय माना गया है। मीडिया में पत्रकारों का भी दायित्व निर्धारित किया गया है कि वह इन शब्दों का प्रयोग नहीं करें। मीडिया का काम समाज को ऊंच-नीच में बांटना नहीं, बल्कि आपस में जोड़ना है।

 

यह पत्रकारिता का ही देन है कि भारत के प्राचीन ग्रंथों में वर्णन किया गया चारों वर्णों की मान्यता को अब उतना महत्व नहीं दिया जाता है। मीडिया में दलित समाज के उत्थान और विकास के लिए चर्चा  परिचर्चा के लिए समय-समय पर विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता रहा है। दलितों को राजनीतिक क्षेत्र में आरक्षण दिलाकर ऊंची जातियों की तरह संसद में प्रतिनिधि बनाने में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सरकारी नौकरियों में भी दलितों की आरक्षण की व्यवस्था की गई ताकि उनका विकास हो सके।

 

आज स्थिति यह है कि दलित समाज अपने को दलित ही बनाए रखना चाहते हैं ताकि उन्हें सरकारी नौकरी मिल सके। लेकिन यह मानसिकता सही नहीं है क्योंकि नौकरी का अर्थ ही नौकर होता है, दलित पहले जहां अस्थित क्षेत्र में नौकर या सेवक हुआ करते थे, आरक्षण की बैसाखी के सहारे सरकारी क्षेत्रों में व्यवस्थित और शिक्षित नौकर बने रहेंगे। लेकिन जरूरत इस बात की है कि दलित इस चक्कर से निकल कर स्वतंत्र कार्य और व्यापार करने के बारे में सोच बनाए।

दलित समाज की राजनीति और मीडिया

भारतीय राजनीति दलितवाद और जातिवाद से पूरी तरह से ग्रसित है। दलित राजनीति के संदर्भ में मीडिया की भूमिका को संदिग्ध माना जा सकता है, क्योंकि मीडिया कभी तो इसका प्रतिकार करता है तो कभी उनके जातिगत आंकड़े का विश्लेषण कर एक प्रकार से इसका विस्तार करता नजर आता है। भारत में दलित समाज की राजनीति को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर देखा जा सकता है

 

  1. दलितों के लिए संसद और विधानसभा सहित स्थानीय निकायों में स्थानों का आरक्षण:- दलितों के लिए स्थानों का आरक्षण उनकी संख्या के आधार पर कर दिया गया है। मीडिया ने भी दलितों के लिए दिए जाने वाले आरक्षण का पूरा समर्थन किया है।

 

  1. दलितों के आधार पर राजनीतिक दलों का निर्माण:- भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में दलितों के वोट के प्रतिशत को ध्यान में रखकर आज ऐसे अनेक राजनीतिक दल निर्मित हो चुके हैं जो अपने को दलित के हितों का रक्षक घोषित करते हैं।

 

  1. जाति के आधार पर मतदान:- मतदान में सभी दलों के नेता अपने क्षेत्र में उम्मीदवार की जाति के आधार पर मतदान की अपील करते हैं। दलितों से उम्मीदवारों के जाति के आधार पर मतदान करने की अपील की जाती है और अनेक बार ऐसा भी होता है कि वह उम्मीदवार जीत भी जाते हैं।

 

  1. दलित नेतृत्व का उदय:- दलितों के लिए आवाज उठाने के लिए वर्तमान में मायावती, उदित राज, रामविलास पासवान जैसे राष्ट्रीय स्तर के नेता उदय हो चुका है। आज स्थिति यह है कि कोई भी राजनीतिक दल अपने को दलितों का हितेषी बताने से नहीं चूकता है, लेकिन सच्चाई यह है कि राजनीतिक दल दलितों के पास पाए जाने वाले वोटों को पाना चाहते हैं और अपनी राजनीतिक चमकाना चाहते हैं।

 

अतः हम कह सकते हैं कि, भारत में दलित समाज की राजनीति में मीडिया की भूमिका के संदर्भ में जो विचार दिए जा सकते हैं, सकारात्मक दृष्टिकोण और नकारात्मक दृष्टिकोण

 

  1. सकारात्मक दृष्टिकोण: दलित राजनीति में मीडिया के प्रयासों के कारण यह संभव हुआ कि मानसिक स्तर पर भी आम लोग दलितों को समान समझने लगे हैं। यह मीडिया के कार्यक्रमों का ही परिणाम है कि दलितों की आर्थिक, शैक्षणिक स्थिति अब बहुत बेहतर हो गई है। मीडिया की सबसे बड़ी भूमिका यह रही है कि इस ने दलितों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया है और दलित अपने को मानसिक स्तर पर अन्य लोगों के समान समझने लगे हैं।

 

  1. नकारात्मक दृष्टिकोण: मीडिया का सबसे ज्यादा नकारात्मक कार्य यह है कि दलित सोच को हवा देकर अधिक पर बढ़ाया है। दलितों को वाणिज्य और व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में आगे ले जाने के बजाय उन्हें आरक्षण में उलझा कर रख दिया है। भारतीय राजनीति को जातिगत सोच में बांधने में मीडिया की भूमिका कम दोषी नहीं है।

 

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निष्कर्ष:

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि दलितों के संदर्भ में मीडिया की भूमिका तो सराहनीय है, लेकिन मीडिया को अपनी भूमिका सतर्क होकर निभानी होगी। मीडिया को विचार करना होगा कि दलित समाज का विकास किन कार्यों से अधिक होगा।

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