सीमांचल ( Simanchal ) बिहार के पूर्वोत्तर भाग में मिथिला क्षेत्र का एक उपनगरीय हिस्सा है जिसमें चार जिले आते हैं – अररिया, पूर्णिया ( Purnea ) , किशनगंज और कटिहार । Simanchal भारत के पिछड़े क्षेत्रों में से एक था, लेकिन अब यह विकासशील चरण के तरफ बढ़ रहा है। Simanchal में शिक्षा की हालत ऐसी है की स्टूडेंट्स किसी तरह हाईस्कूल तक की पढ़ाई करने के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। यहाँ पर 10वीं के इम्तिहान के बाद पढ़ाई छोड़ ने का सिलसिला लगभग 98 प्रतिशत है (लेकिन वर्तमान का डेटा अलग-अलग हो सकता है, सरकारी डेटा अपडेट होने के बाद यहाँ पर भी अपडेट हो जायेगा)। सीमांचल Simanchal पूर्णिया डिवीजन के अंतर्गत आता है।

Seemanchal में 2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या लगभग 2 करोड़ और क्षेत्र सीमा लगभग 20,000 वर्ग किमी, 09 जिले और 30% साक्षरता है।

Simanchal

सिमांचा सीमांचल ( Simanchal / purnia ) का इतिहास

पूर्णिया डिवीजन, जोकी पहले सिर्फ Purnea जिले का ही हिस्सा था, अब यह मिथिला क्षेत्र का हिस्सा है। मिथिला को पहले भारत के आर्य लोगों द्वारा प्रमुखता मिली थी और आर्य लोगों ने मिथिला साम्राज्य (Kingdom of the Videhas) की स्थापना किये थे। यह क्षेत्र वैदिक काल (1100-500 ईसा पूर्व) के दौरान,  कुरु साम्राज्य और पंकला के लिए दक्षिण एशिया के प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्रों में से एक बन गया था। उस समय विदेहास के राजाओं को जनकस कहा जाता था। और बाद में मिथिला साम्राज्य को वाजी संघ में शामिल किया गया था, और जिसकी राजधानी वैशाली शहर में थी, जो अभी मिथिला में है।

मुगल शासन के दौरान, पूर्णिया ( Purnea ) एक बाहरी सैन्य प्रांत बन गया था, और यहाँ से वसूला गया राजस्व (tax) ज्यादातर सुरक्षा पर खर्च किया जाता था, क्यों के उत्तर और पूर्व के सीमा से जनजातियों को रोकना था। 1757 में कलकत्ता को मुग़ल द्वारा कब्जा करने के बाद, पूर्णिया (Purnia ) के स्थानीय गवर्नर ने सिराज उद-दौला के खिलाफ विद्रोह किया। 1765 में, इस इलाके को बंगाल के साथ मिला लिया गया और यहाँ ब्रिटिश का कब्जा बन गया था। 10 फरवरी, 1770 को पूर्णिया जिला को ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा गठित किया गया था। आजाद भारत में पूर्णिया जिले को तीन जिलों में विभाजित किया गया है: 1976 में कटिहार जिला, और 1990 में अररिया और किशनगंज जिला। अब पूर्णिया डिवीजन में अररिया, कटिहार, पूर्णिया और कटिहार जिला आते हैं।

Simanchal / Purnea में अंग्रेजी शासन और स्वतंत्रता संग्राम

यहाँ के अंतिम गवर्नर मो. अली खान थे जिन्हें 1770 में श्री डुकरेल, अंग्रेजी पर्यवेक्षक / कलेक्टर द्वारा नियुक्त किया गया था। पूर्णिया के लिए ब्रिटिश शासन के प्रारंभिक वर्षों में बहुत परेशानी थी। पूर्णियाँ ( Purnea ) जिला 1770 के महान अकाल के दौरान बहुत परेशान और पीड़ित था। पुराने रिकॉर्ड से, ऐसा लगता है कि जिले में ब्रिटिश शासन की स्थापना के तुरंत बाद पूर्णिया में यूरोपीय बसने लगे थे। 1771 तक, रामबाग के नाम से जाना जाने वाला क्षेत्र में कई यूरोपीय लोग बस गए थे, अंग्रेजों द्वारा रामबाग में छोड़ी गई एकमात्र इमारत ‘चर्च और प्रीस्ट्स’ अभी भी मौजूद है। रोमन कैथोलिक चर्च को पूर्णिया ( Purnea ) के नए रेलवे स्टेशन को बनाने के लिए नष्ट कर दिया गया।

यहाँ यूरोपियन के कुछ घर भी स्थापित थे इन सब को भी नष्ट कर दिया गया। दार्जिलिंग के लोरेटो कॉन्वेंट के नन लगभग 1882 के आसपास पूर्णियाँ आए थे और purnea जिले के बच्चों के लिए एक दैनिक स्कूल और बोर्डिंग स्कूल खोले थे। जब बंगाल के जेसुइट (Jesuit Mission) मिशन ने कैपचिन मिशन (Capuchin Mission) से पूर्णियाँ मिशन को ले लिए और इसे संभाले, तो यह दोनों स्कूल को बंद कर दिया गया और फिर से नन दार्जिलिंग लौट गये। यह घर अभी भी खड़ा है और कंबलिन के रूप में जाना जाता है। यह पूर्णियाँ ( Purnea ) शहर के सबसे पुराने घरों में से एक है और अब एलिसन द्वारा कब्जा कर लिया गया है।

Simanchal / Purnea की किसान सभा और आंदोलन

Simanchal / Purnia की किसान सभा और आंदोलन, जो 20वीं शताब्दी के तीसरे दशक में purnea जिले में एक गंभीर आंदोलन के लिए जिम्मेदार बना था और लगभग 20 वर्षों तक प्रमुख रूप से चला था, कृषि अर्थव्यवस्था के लिए इसकी जड़ें बहुत मजबूत हुई थीं और इस क्षेत्र में स्थायी भूमि-प्रभुत्व की बहुमूल्य संरचना हुई थी। 1922-23 के करीब मुंगेर में किसान सभा का गठन किया गया था। 1940-41 के बाद, किसान सभा आंदोलन धीरे-धीरे कांग्रेस आंदोलन में विलय हो गया।

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Simanchal / purnea की उस समय की शिक्षा व्यस्था

इस इलाके में उस समय उच्च शिक्षा के लिए कोई सुविधा नहीं थी और जिन छात्रों को उच्च शिक्षा लेनी होती थी उन्हें कलकत्ता या पटना जाना पड़ता था। बिहार नेशनल कॉलेज और टी.के. घोष अकादमी को एक गुप्त छात्र संगठन के लिए संदेह के घेरे में बंद कर दिया गया और जो राजद्रोह में शामिल हो गए थे और जब कि इन दोनों संस्थानों में पूर्णिया ( Purnea ) के छात्रों की जमावड़ा थी। पूर्णिया के एक लड़के जिनका नाम अतुल चंद्र मजूमदार था और वह जो बी.एन. कॉलेज, पटना के छात्र थे इन को भारत के रक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था।

1919 से, पूर्णियाँ ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नीति और उद्देश्यों का बारीकी से पालन किया था। पूर्णियाँ ( Purnea ) के कुछ प्रतिनिधियों ने 1920 में कांग्रेस के नागपुर सत्र में भाग लिया और इस क्षण महात्मा गांधी ने असहयोग के लिए आह्वान किये थे, इस जिले में कई स्वयंसेवक भी थे। स्थानीय नेताओं में से कुछ जैसे गोकुल कृष्ण रॉय, सत्येंद्र नारायण राय और कुछ अन्य जिन्होंने कोर्ट में अपना वकालत छोड़ दिया और आंदोलन में शामिल हो गए।

1921 में, कटिहार में एक राष्ट्रीय विद्यालय शुरू किया गया था। श्री राजेंद्र प्रसाद ने 1921 में पूर्णियाँ ( Purnea ) जिले का दौरा किया और पूर्णियाँ और अन्य स्थानों पर बैठकों को संबोधित किया

Seemanchal / Purnea में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की रणनीति

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की रणनीति पूरी तरह पूर्णियाँ ( Purnea ) के लोगों द्वारा अपनायी गई थी। महात्मा गांधी ने 1929 में पूर्णियाँ ( Purnia ) का दौरा किये, जिसके दौरान उन्होंने नाज़र्गुन के राजा से मुलाकात की और किसानगंज, बिष्णूपुर, अररिया और पूर्णिया ( Purnea ) सहित विभिन्न स्थानों पर बड़ी भीड़ की बैठकों को संबोधित किये। पूर्णियाँ ( Purnea ) जिले में भूमि सर्वेक्षण और निपटारे के संचालन 1952 में शुरू हुए और निपटारे के संचालन 1960 में समाप्त हुए। यहाँ 1925 में कोलेरा का एक बहुत ही गंभीर प्रकोप हुआ और इस अवधि के दौरान चेचक और मलेरिया का बहुत अधिक प्रकोप हुआ था।

Simanchal / purnia का धार्मिक संगठन

इस क्षेत्र में कई धार्मिक सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं जिनमें इस्लामिक इज्तेमा जैसे दगरुआ इज्तेमा, रमतमत इजेतामा और अररिया इज्तेमा और कई हिंदू सम्मेलन शामिल हैं।

Simanchal की बोली और भाषा

सुरजापुरी , मैथिली , कुल्हैया इस क्षेत्र के अधिकांश निवासियों की मूल भाषा है। इस क्षेत्र में हिंदी , उर्दू , भोजपुरी , संथाली और बंगाली बोली भी बोली जाती हैं।

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Simanchal के उल्लेखनीय व्यक्तित्व (Notable personalities)

1. तस्लिमुद्दीन, क्षेत्र के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक थे।
2. फनिश्वर नाथ रेणू, लेखक और संस्मरणवादी।
3. मोहम्मद असरुल हक, राजनेता और शिक्षाविद।
4. प्रदीप कुमार सिंह, राजनेता।

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