शिक्षा का अर्थ एवं उद्देश्य क्या होता है? What is education in Hindi

शिक्षा का अर्थ

शिक्षा पर विद्वानों के विचार

समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों व नीतिकारों ने शिक्षा के सम्बन्ध में अपने विचार दिए हैं। शिक्षा के अर्थ को समझने में ये विचार भी हमारी सहायता करते हैं। कुछ शिक्षा सम्बन्धी मुख्य विचार यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे हैंः –

  1. शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक और मनुष्य के शरीर, मन तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्कृष्ट विकास से है। (महात्मा गांधी)
  2. मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। (स्वामी विवेकानन्द)
  3. शिक्षा व्यक्ति की उन सभी भीतरी शक्तियों का विकास है जिससे वह अपने वातावरण पर नियंत्रण रखकर अपने उत्तरदायित्त्वों का निर्वाह कर सके। (जॉन ड्यूवी)
  4. शिक्षा व्यक्ति के समन्वित विकास की प्रक्रिया है। (जिद्दू कृष्णमूर्ति)
  5. शिक्षा का अर्थ अन्तःशक्तियों का बाह्य जीवन से समन्वय स्थापित करना है। (हर्बट स्पैन्सर)
  6. शिक्षा मानव की सम्पूर्ण शक्तियों का प्राकृतिक, प्रगतिशील और सामंजस्यपूर्ण विकास है। (पेस्तालॉजी)
  7. शिक्षा राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक विकास का शक्तिशाली साधन है, शिक्षा राष्ट्रीय सम्पन्नता एवं राष्ट्र कल्याण की कुंजी है।
  8. शिक्षा बच्चे की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है। (‘सभी के लिए शिक्षा’ पर विश्वव्यापी घोषणा, 1990)

प्राचीन भारत में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ‘मुक्ति’ की चाह रही है (सा विद्या या विमुक्तये / विद्या उसे कहते हैं जो विमुक्त कर दे)। बाद में समय के रूप बदलने से शिक्षा ने भी उसी तरह उद्देश्य बदल लिए।

शिक्षा का अर्थ

शिक्षा में ज्ञान, उचित आचरण और तकनीकी दक्षता, शिक्षण और विद्या प्राप्ति आदि समाविष्ट हैं। इस प्रकार यह कौशलों (skills), व्यापारों या व्यवसायों एवं मानसिक, नैतिक और सौन्दर्यविषयक के उत्कर्ष पर केंद्रित है।

शिक्षा, समाज की एक पीढ़ी द्वारा अपने से निचली पीढ़ी को अपने ज्ञान के हस्तांतरण का प्रयास है। इस विचार से शिक्षा एक संस्था के रूप में काम करती है, जो व्यक्ति विशेष को समाज से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा समाज की संस्कृति की निरंतरता को बनाए रखती है। बच्चा शिक्षा द्वारा समाज के आधारभूत नियमों, व्यवस्थाओं, समाज के प्रतिमानों एवं मूल्यों को सीखता है। बच्चा समाज से तभी जुड़ पाता है जब वह उस समाज विशेष के इतिहास से अभिमुख होता है।

शिक्षा व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यक्तित्त्व का विकसित करने वाली प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया उसे समाज में एक वयस्क की भूमिका निभाने के लिए समाजीकृत करती है तथा समाज के सदस्य एवं एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए व्यक्ति को आवश्यक ज्ञान तथा कौशल उपलब्ध कराती है। शिक्षा शब्द संस्कृत भाषा की ‘शिक्ष्’ धातु में ‘अ’ प्रत्यय लगाने से बना है। ‘शिक्ष्’ का अर्थ है सीखना और सिखाना। ‘शिक्षा’ शब्द का अर्थ हुआ सीखने-सिखाने की क्रिया।

जब हम शिक्षा शब्द के प्रयोग को देखते हैं तो मोटे तौर पर यह दो रूपों में प्रयोग में लाया जाता है, व्यापक रूप में तथा संकुचित रूप में। व्यापक अर्थ में शिक्षा किसी समाज में सदैव चलने वाली सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का विकास, उसके ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि एवं व्यवहार में परिवर्तन किया जाता है और इस प्रकार उसे सभ्य, सुसंस्कृत एवं योग्य नागरिक बनाया जाता है। मनुष्य क्षण-प्रतिक्षण नए-नए अनुभव प्राप्त करता है व करवाता है, जिससे उसका दिन-प्रतिदन का व्यवहार प्रभावित होता है। उसका यह सीखना-सिखाना विभिन्न समूहों, उत्सवों, पत्र-पत्रिकाओं, दूरदर्शन आदि से अनौपचारिक रूप से होता है। यही सीखना-सिखाना शिक्षा के व्यापक तथा विस्तृत रूप में आते हैं। संकुचित अर्थ में शिक्षा किसी समाज में एक निश्चित समय तथा निश्चित स्थानों (विद्यालय, महाविद्यालय) में सुनियोजित ढंग से चलने वाली एक सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा छात्र निश्चित पाठ्यक्रम को पढ़कर अनेक परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना सीखता है।

शिक्षा का उद्देश्य

उद्देश्य एक पूर्वदर्शित लक्ष्य है जो किसी क्रिया को संचालित करता है अथवा व्यवहार को प्रेरित करता है। यदि लक्ष्य निश्चित तथा स्पष्ट होता है तो व्यक्ति की दिया उस समय तह उत्साहपूर्वक चलती रहती है, जब तक वह उस लक्ष्य ओ प्राप्त नहीं कर लेता। जैसे-जैसे लक्ष्य के निकट आता जाता है जब व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने को ही उद्देश्य की प्राप्ति कहतें हैं। संक्षेप में उद्देश्य की पूर्वदर्शित लक्ष्य है जिसको प्राप्त करने के लिए व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक उत्साह के साथ चिंतनशील रहते हुए क्रियाशील होता है।

शिक्षा के उद्देश्यों के विभिन्न रूप होते हैं। मोटे तौर पर हम शिक्षा के सभी उद्देश्यों को निम्नलिखित शीर्षकों में विभाजित कर रहें हैं –

1. विशिष्ट उद्देश्य

विशिष्ट उद्देश्यों को “ असामान्य उद्देश्यों की संज्ञा दी जाती है। इन उदेश्यों का क्षेत्र तथा प्रकृति सीमित होती है। यही नहीं, इनका निर्माण किसी भी विशेष परिस्थिति तथा विशेष कारण को ध्यान में रहते हुए किया जाता है। इस दृष्टि से यह उद्देश्य लचीले, अनुकूल योग्य तथा परिवर्तनशील होते हैं दुसरे शब्द में शिक्षा के विशिष्ट उद्देश्य देश, काल तथा परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं।

2. सार्वभौमिक उद्देश्य

सार्वभौमिक उद्देश्य मानव जाती पर समान रूप से लागू होती है। इन उद्देश्यों का तात्पर्य व्यक्ति में वांछनीय गुणों का विकास करना है। अत: इनका क्षेत्र विशिष्ट उद्देश्यों की भांति किसी विशेष स्थान अथवा देश तक सीमित न रह कर सम्पूर्ण मानव जाती है। सामान्य उद्देश्यों की प्रकृति भी विशिष्ट उद्देश्यों की भांती सीमित नहीं होती। अत: ये उद्देश्य सनातन, निश्चित तथा अपरिवर्तनशील होते है। संसार के सभी शिक्षा दर्शनों ने इन उद्देश्यों के सार्वभौमिक महत्वों को स्वीकार किया है। मानव के व्यक्तित्व का संगठन उचित शारीरिक तथा मानसिक विकास समाज की प्रगति, प्रेम तथा अहिंसा आदि शिक्षा के कुछ ऐसे सार्वभौमिकउद्देश्य है जो, शिक्षा को सार्वभौमिक रूप प्रदान करते हैं।

3. वैयक्तिक उद्देश्य

व्यक्ति वादियों के अनुसार समाज के अपेक्षा व्यक्ति बड़ा है अत: शिक्षा का वैयक्तिक उदेश्य व्यक्ति की व्यक्तिगत शक्तिओं को पूर्णरूपेण विकसित करने पर बल देता है। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री सर टी० पी० नन ने इस उदेश्य पर बल देते हुए लिखा है – “ संसार में जो भी अच्छाई आती है वह व्यक्तिगत पुरूषों तथा स्त्रियों के स्वतंत्र प्रयासों द्वारा आती है।शिक्षा की व्यवस्था इसी सत्य पर आधारित होनी चाहिये तथा शिक्षा को ऐसी दशायें उत्पन्न करनी चाहिये जो वैयक्तिकता का पूर्ण विकास हो सके तथा व्यक्ति मानव जीवन को अपना मौलिक योग दे सके “

4. सामाजिक उद्देश्य

समाज वादियों के अनुसार व्यक्ति के अपेक्षा समाज बड़ा है। अत: वे शिक्षा सामाजिक उदेश्य पर विशेष बल देते हैं। उनका विश्वास है कि व्यक्ति सामाजिक प्राणी है। वह समाज से अलग रह कर अपना विकास नहीं कर सकता है। अत: उनके अनुसार व्यक्ति को अपनी वैयक्तिकता का विकास समाज की आवश्यकताओं तथा आदर्शों को ध्यान में रखते हुए करना चाहिये।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है की शिक्षा के उद्देश्यों का व्यक्ति के जीवन तथा समाज के आदर्शों से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। यदि हम व्यक्ति तथा समाज दोनों के लिए अलग-अलग शिक्षा के उद्देश्यों का निर्माण करना चाहें, तो हम दोनों की आवश्यकताओं तथा आदर्शों को ध्यान में रखना होगा।

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