राजा राममोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत कहा जाता है। राजा राममोहन राय का जन्म 22 मई 1972 ई. को हुआ था। इनका जन्म पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के राधा नगर में एक धनी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह पश्चिमी शिक्षा से प्रभावित एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे।

सामाजिक और धार्मिक सुधारों में ब्रह्म समाज का योगदान:

ब्रह्म समाज का उद्देश्य वेदों और उपनिषदों की श्रेष्ठता को स्थापित करना था। और इस कारण उसने उन तत्कालीन रुढ़िवादी सामाजिक रीतियों को चुनौती दी जो हिंदू धर्म को कमजोर कर रही थी। सुधार आंदोलन पर यद्यपि पश्चिमी विचारों, पश्चिमी शिक्षा और इसाई धर्म प्रचारकों की गतिविधियों का प्रभाव था, फिर भी राजा राममोहन राय जैसे सामाजिक – सांस्कृतिक सुधारकों ने इन्हीं विचारों का प्रयोग हिंदू धर्म पर बढ़ते पश्चिमी प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए किया।

इस सुधार आंदोलन का मकसद भारतीय समाज में घुस चुकी कुरीतियों को जड़ से खत्म करना था, ताकि हिंदू धर्म पुनर्जीवित हो और राष्ट्रीय चेतना को जगाया जा सके।

यह ना सिर्फ भारतीय समाज और धर्म पर पड़ने वाले पश्चिमी प्रभाव को रोकने में सफल रहा, बल्कि इसने हिंदू धर्म में भी नई जान फूंक दी। इसका नतीजा भारतीय पुनर्जागरण के रूप में सामने आया।

ब्रह्म समाज की स्थापना

राजा राममोहन राय (1772 – 1833) ने 20 अगस्त, 1828 को कोलकाता में ब्रह्म सभा की स्थापना की। 1830 में इसका नाम बदलकर ब्रह्म समाज कर दिया गया। ब्रह्म समाज सबसे पहला सुधार आंदोलन था जो पश्चिमी विचारों से प्रभावित था। ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ होता है, वह जो ब्रह्म की उपासना करता है और ‘समाज’ शब्द का अर्थ समुदाय है। इस तरह ब्रह्म समाज उस समुदाय का प्रतिनिधित्व करता था जो ब्रह्म में विश्वास रखता था।

यानी उसमें विश्वास, जो संसार के निर्माता और रक्षक हैं और शाश्वत और अपरिवर्तनीय होने के नाते सर्वोच्च है। यद्यपि राजा राममोहन राय पूरी तरह से एक समाज सुधारक थे। वह हिंदू धर्म में आधुनिकता लाने का प्रयास करने वाले भी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ईश्वर के एकत्व की बात की।

1830 में लिखे गए “ट्रस्ट डीड” में समाज के उद्देश्यों को इस प्रकार बताया, ब्रह्मांड के रचयिता और परीक्षक होने के नाते उस अनंत, अचिंतनीय, अपरिवर्तनीय की पूजा और आराधना करना।

ब्रह्म समाज के सिद्धांत

ब्रह्म समाज के धार्मिक और सामाजिक सिद्धांत को अलग-अलग बिंदुओं के अंतर्गत वर्णित किया गया है:-

1. धार्मिक सिद्धांत: ब्रह्म समाज के धार्मिक सिद्धांत निम्न है-

(a) ईश्वर एक है। वह संसार को बनाने वाले हैं, सभी का पालनहार और रक्षक हैं। वह निराकार और निर्विकार हैं। ईश्वर की शक्ति, प्रेम और पवित्रता असीमित है।

(b) आत्मा अमर है और वह अपने कामों के लिए भगवान के समक्ष उत्तरदाई है। उसमें उन्नति की असीमित ताकत है।

(c) भगवान के अस्तित्व की अनुभूति और आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रार्थना आवश्यक है।

(d) पुरुष या पुस्तक को मोक्ष का एकमात्र साधन नहीं माना जाना चाहिए।

(e) मूर्ति पूजा का खंडन किया।

(f) सभी धर्मों में प्रतिपादित मूल सिद्धांतों के प्रति आदर व्यक्त किया।

(g) कर्मकांड व अंधविश्वासों का विरोध किया।

(h) विश्वबंधुता के सिद्धांतों को मान्यता दी।

 

2. सामाजिक सिद्धांत: ब्रह्म समाज के सामाजिक सिद्धांत निम्नलिखित हैं

(a) सती प्रथा, बाल विवाह, जाति प्रथा, छुआछूत, कन्या विक्रय, और कन्या वध इत्यादि कुरीतियों को समाप्त करने के लिए ब्रह्म समाज ने आंदोलन किया।

(b) स्त्रियों के उत्थान के लिए स्त्री शिक्षा का समर्थन किया।

(c) राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद देवेंद्र नाथ टैगोर और केशवचंद्र सेन ने ब्रह्म समाज को नेतृत्व प्रदान किया।

(d) देवेंद्र नाथ ने 1839 में तत्वबोधिनी सभा की स्थापना की।

(e) केशव चंद्र सेन ने ब्रह्मसमाज की स्थापना की। आर सी मजूमदार ने लिखा है, ” केशवचंद्र सेन के नेतृत्व में ब्रह्म समाज ने सामाजिक सुधार का एक विस्तृत कार्यक्रम आरंभ किया जो कि भारतीय पुनर्जागरण का एक प्रमुख अंग बन गया। इसमें महिलाओं के स्तर में सुधार, मजदूरों की शिक्षा, नैतिकता, दान व कम मूल्य पर अच्छे साहित्य के प्रकाशन को महत्व दिया गया।”

(f) ब्रह्म समाज के सदस्यों को साप्ताहिक अधिवेशनों में वेदों का पाठ और अपने उपनिषदों के बंगला अनुवादों का वाचन करने का कार्यक्रम सौंपा गया था।

 

Janiye Chhattisgarh me kitne jile hai Hindi me

राजा राममोहन राय का शुरुआती जीवन दर्शन

राजा राममोहन राय का जन्म बंगाल के राधा नगर में 1772 में हुआ था। उन्होंने अरबी, फारसी, अंग्रेजी, फ्रेंच और ग्रीक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। राजा राममोहन राय ने कई धर्मों का भी अध्ययन किया जैसे हिंदू धर्म, ईसाई धर्म इस्लाम धर्म। उन पर अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी विचारों का गहरा प्रभाव था।

उन्होंने ईश्वर के एक होने की हिमायत की और मूर्ति पूजा, रीति-रिवाज, अंधविश्वासों और ढोंग का घोर विरोध किया। उन्होंने लोगों तक अपना संदेश भाषणों, चर्चाओं, लिखो और किताबों के जरिए से पहुंचाया। राजा राममोहन राय अपने स्वच्छंद विचारों के प्रतिपादन और हिंदू धर्म के सुधार के लिए ब्रह्म समाज की स्थापना की जो उन दिनों दयनीय अवस्था में था।

हिंदू अपने वास्तविक धर्म को भूल गए थे। इसका स्थान कर्मकांड, अंधविश्वास, रुढ़िवादी विचारों और सामाजिक बुराइयों ने ले लिया था।

अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी स्वछंद विचारों ने शिक्षित वर्गों और भारतीय समाज के बीच एक अलगाव पैदा कर दिया था। ईसाई धर्म प्रचारकों ने इसका लाभ उठाया और बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन के लिए लोगों को आकर्षित किया। इस पृष्ठभूमि में राजा राममोहन और उनके ब्रह्म समाज ने जड़ें जमा चुकी सामाजिक बुराइयों को और हिंदू धर्म और समाज में सुधार लाने का प्रयास शुरू किया।

ब्रह्मसमाज में ईसाई धर्म द्वारा खड़ी की गई चुनौतियों का सामना करने के लिए प्राचीन हिंदू दर्शन, वेदों-उपदेशों जैसे साहित्य पर जोर दिया। यह सच है कि ब्रह्म समाज पर ईसाई धर्म का प्रभाव था, लेकिन यह भी सच है कि इसकी प्रेरणा का स्रोत इसाई धर्म नहीं था, बल्कि प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथ थे।

ब्रह्म समाज ने न सिर्फ हिंदू धर्म की अन्य धर्मों से बराबरी पर जोर दिया, बल्कि इसने यह भी दावा किया कि ईश्वर एक है और सारे धर्म यही सच बताते हैं। ब्रह्म समाज में कर्मकांड का विरोध किया और कहा कि सामाजिक बुराइयों का संबंध धर्म से नहीं होता है। इसके साथ ही, इसने धर्म की व्याख्या करते की, और इस प्रकार यह अनेक का मासिक बुराइयों को रोकने और हिंदुत्व में आधुनिकता के विचारों का समावेश करने में सफल रहा।

राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज की सामाजिक बुराइयों के खिलाफ धर्म युद्ध

ब्रह्म समाज ने उन सामाजिक बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेंकने की बीड़ा उठाया जो व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में घर कर चुकी थी और अंदर से हिंदू धर्म को खोखला बना रही थी।

किसने सती प्रथा, बाल विवाह, बहुविवाह, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, जाति प्रथा और छुआछूत के विरुद्ध एक धर्म युद्ध शेर दिया। इसने महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह, अंतरजातीय विवाह इत्यादि का समर्थन किया और इन्हें हैं सामाजिक बुराइयों को दूर करने वाले समाधान के रूप में प्रस्तुत किया।

राजा राममोहन राय के प्रयासों से 1829 में ब्रिटिश सरकार ने सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने लोकप्रिय परंपराओं और रीतियों को बदलने का प्रयास किया और स्पष्ट किया कि यह वास्तविक हिंदू दर्शन से अलग है, जिसका प्रतिनिधित्व वेद और उपनिषद करते हैं।

 

सती प्रथा के तहत पत्नी अपने मरे हुए पति की चिता के साथ जल जाती थी। ब्रह्म समाज ने प्राचीन भारतीय संस्कृति की प्रस्तुति से भारतीयों के लिए एक राष्ट्रीय संवेदना पैदा करने का प्रयास किया। ऐसा करने के दौरान इसने समाज के बौद्धिक विकास के लक्ष्य से अपना ध्यान भटकने नहीं दिया। इस प्रकार इसने आधुनिक विचारों और शिक्षा का सदैव स्वागत किया। ब्रह्म समाज ने जनता के बीच भारतीय संस्कृति और धर्म की सकारात्मकता संदर्भ में रखकर राष्ट्रीय भावना को जगाया। इसने हिंदू धर्म की श्रेष्ठता का प्रचार किया और इसमें हो चुकी सामाजिक बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया।

 

राजा राममोहन राय क्या शिक्षा के प्रबल हिमायती थे। सामाजिक कुरीति सती प्रथा को समाप्त करने के लिए उन्होंने महत्वपूर्ण प्रयास किए। उनसे संबंधित मूलभूत तथ्य इस प्रकार है –

  1. राजा राममोहन राय आरंभ से ही विविध धर्म के मूल ग्रंथों का अध्ययन करने में रूचि प्रदर्शित की।
  2. पटना में अरबी और फारसी का अध्ययन किया।
  3. 16 वर्ष की अवस्था में मूर्ति पूजा के विरुद्ध अपने विचार प्रस्तुत कर पुस्तिका में प्रदर्शित किए। इससे दुखी होकर पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया।
  4. बनारस में संस्कृत भाषा व हिंदू धर्म ग्रंथ का अध्ययन किया।
  5. 1803 में मुर्शिदाबाद में फारसी पुस्तक उल मुजाहिदीन में सभी धर्मों के में प्रचलित अंधविश्वासों की निंदा की। मूर्ति पूजा का खंडन किया।
  6. 815 आत्मीय सभा की स्थापना की ( एकेश्वरवाद)।
  7. 1820 ई. में ‘दी प्रिसेप्टस ऑफ जीसस – दी गॉइड टू हैप्पीनेस’ पुस्तिका में ईसा मसीह की शिक्षा कृष्णा की।
  8. 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की।
  9. 1830 में मुगल सम्राट के वकील बनकर लंदन गए।
  10. 27 सितंबर, 1833 को लंदन के ब्रिस्टल के समीप स्टेपलटन में इनकी मृत्यु हो गई।

राजा राममोहन राय की उपलब्धियां

राजा राममोहन राय का नाम धार्मिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में अग्रणी है। उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी – सती प्रथा का अंत।

1. विद्धता: राजा राममोहन राय संस्कृत, अरबी और फारसी के विद्वान थे। वह हिंदी, लेटिन, ग्रीक और अंग्रेजी भाषा भी जानते थे। उन्होंने वेद, उपनिषद, वेदांत, हिंदू धर्म ग्रंथ, कुरान और बाइबल का गहन अध्ययन किया। काफी लगन और परिश्रम के बाद वेदों और उपनिषदों का बांग्ला में अनुवाद किया। उनकी कुछ निम्न प्रकार से है:-
a. तुहपात-उल-मुजाहिदीन
b. दी प्रिसेप्टस ऑफ जीसस – दी गॉइड टू हैप्पीनेस
c. हिंदी क्रिश्चियन पीपल

 

2. धार्मिक और सामाजिक सुधार: धार्मिक और सामाजिक सुधार के कार्यों में भी मोहन राय विशेष रुचि रखते थे। धर्म और समाज सुधार से संबंधित उनके प्रमुख काम निम्नलिखित है:-

a. आरंभ में आत्मीय समाज और बाद में ब्रह्मसमाज की स्थापना करके राजा राममोहन राय ने 19वीं शताब्दी में धार्मिक व सामाजिक सुधार आंदोलन को जन्म दिया।

b. बाल काल में ही अपनी विधवा भाभी को सती होते देखकर उन्होंने इस अमाननीय प्रथा का विरोध करने का निश्चय कर लिया था, और इसके लिए विलियम बैंटिक के सहयोग से कानून बनवाया।

c. बाल विवाह, बहु विवाह, छुआछूत, पर्दा प्रथा इत्यादि कुरीतियों का विरोध किया।

d. स्त्रियों का स्तर ऊंचा उठाने के लिए स्त्री शिक्षा का समर्थन किया।

e. मूर्ति पूजा, यज्ञ, पशु बलिदान और कर्मकांडों का विरोध करके धार्मिक सुधार के प्रयास किए।

f. उनका मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म व समाज की कुरीतियों को दूर करना था

 

3. पत्रकारिता: राजा राममोहन राय ने आजादी के आंदोलन में अपनी पत्रकारिता से आंदोलन को नया रूप दिया।

a. 1821 में ‘संवाद कौमुदी’ बांग्ला साप्ताहिक समाचार पत्र प्रकाशित कर के अपने सिद्धांतों का प्रचार किया।

b. 1822 में फारसी का प्रथम अखबार मिरातुल अखबार कोलकाता से प्रकाशित हुआ।

c. राजा राममोहन राय की प्रेरणा से 4 भाषाओं – बांग्ला, फारसी, हिंदी और अंग्रेजी में बांग्ला हेराल्ड का प्रकाशन आरंभ हुआ।

d. वह समाचार पत्रों की स्थापना के प्रबल समर्थक थे।

राजा राममोहन राय के जीवन का मूल्यांकन:

मिस कॉलेट ने राजा राममोहन राय को प्रतिक्रिया और प्रगति के माध्यम का बिंदु माना है। वस्तुतः राजा राममोहन राय के समय भारत ने प्रतिक्रियावादी युग से निकलकर आधुनिक युग में प्रवेश किया। इसलिए उन्हें नए युग का अग्रदूत और आधुनिक काल के पुनर्जागरण आंदोलन का जनक भी कहा जाता है। भारतीय मनीषी विशेषकर पाश्चात्य शिक्षित वर्ग, तर्कवाद, विज्ञानवाद और मानववाद से प्रभावित हुआ। उन्होंने इसे सरलीकृत कर इन पहलुओं से भारतीयों को परिचित कराया। राजा राममोहन राय के प्रयासों से भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान की भावना जागृत हुई। उनके अंदर उत्साह और स्वाभिमान जाग उठा।

 

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