Hindi Kawita Ghazal Shayari & Jokes

Hindi Kawita , Peom ka nayab sangam yahan pe padhe

Hindi Kawita , Peom ka nayab sangam yahan pe padhe

लाल टमाटर
गोल गोल यह लाल टमाटर
होते जिससे गाल टमाटर
खून बढ़ाता लाल टमाटर
फूर्ति लाल लाल टमाटर
स्वास्थ्या बनाता लाल टमाटर
मस्त बनाता लाल टमाटर
हम खाएँगे लाल टमाटर
बन जाएँगे लाल टमाटर.

 

आलू कचालू
आलू कचालू बेटा कहाँ गए थे,
बन्दर की झोपडी में सो रहे थे,
बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,
मम्मी ने प्यार किया हंस रहे थे,
पापा ने पैसे दिए नाच रहे थे,
भैया ने लड्डू दिए खा रहे थे….

 

प्यारी माँ
मेरी प्यार माँ तू कितनी प्यारी है माँ
जग है कांटों की सेज तू फुलवारी है
तेरी वजह से मैं इस जग में आया
तूने मुझे जीना सिखाया
माँ तू मुझे अच्छी अच्छी बातें है सिखाती
करूं जो मैं शैतानी तो डांट भी लगाती
तेरी ममता के साये में बीता मेरा बचपन
आशीष दे माँ तेरी सेवा में हो मेरा यह जीवन अर्पण

 

आ रही रवि की सवारी।
नव-किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों-से अनुचरों ने स्व र्ण की पोशाक धारी।
आ रही रवि की सवारी।

विहग, बंदी और चारण,
गा रही है कीर्ति-गायन,
छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी।
आ रही रवि की सवारी।

चाहता, उछलूँ विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह-
रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी।
आ रही रवि की सवारी।

 

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है
हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं –
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे –
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल? –
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

 

में इस उम्मीद से डूबा की तू बचा लेगा
में इस उम्मीद से डूबा की तू बचा लेगा
अब इस के बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा !!
में इस उम्मीद से डूबा की तू बचा लेगा
में भुज गया तो हमेशा के लिए भुज ही जाउगा
कोई चिराग नहीं हु जो फिर जला लेगा
अब इस के बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा !!
में इस उम्मीद से डूबा की तू बचा लेगा
अब इस के बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा !!
में उसका हो नहीं सकता बता देना उसे
लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा
अब इस के बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा
में इस उम्मीद से डूबा की तू बचा लेगा !!

 

तू युद्ध कर
माना हालात प्रतिकूल हैं, रास्तों पर बिछे शूल हैं
रिश्तों पे जम गई धूल है
पर तू खुद अपना अवरोध न बन
तू उठ…… खुद अपनी राह बना………………………..
माना सूरज अँधेरे में खो गया है……
पर रात अभी हुई नहीं, यह तो प्रभात की बेला है
तेरे संग है उम्मीदें, किसने कहा तू अकेला है
तू खुद अपना विहान बन, तू खुद अपना विधान बन………………………..
सत्य की जीत हीं तेरा लक्ष्य हो
अपने मन का धीरज, तू कभी न खो
रण छोड़ने वाले होते हैं कायर
तू तो परमवीर है, तू युद्ध कर – तू युद्ध कर………………………..
इस युद्ध भूमि पर, तू अपनी विजयगाथा लिख
जीतकर के ये जंग, तू बन जा वीर अमिट
तू खुद सर्व समर्थ है, वीरता से जीने का हीं कुछ अर्थ है
तू युद्ध कर – बस युद्ध कर………………………..

 

हे वीर पुरुष
हे वीर पुरुष, पुरुषार्थ करो
तुम अपना मान बढ़ाओ न …….
अपनी इच्छा शक्ति के बल पर
उनको जवाब दे आओ न ………………………..
वे वीर पुरुष होते हीं नहीं
जो दूजों को तड़पाते हैं
वे वीर पुरुष होते सच्चे
जो दूजों का मान बढ़ाते हैं………………………..
इतनी जल्दी थक जाओ नहीं
चलना तुमको अभी कोसों है
पांडव तो अब भी पाँच हीं हैं
पर कौरव अब भी सौ-सौ हैं………………………..

 

पश्चाताप
हम पशु न रहे
न मानव हीं रहे
जब से हम भी
बिकने लगे
आत्मबंधन के नाम पर
प्राण प्रतिष्ठा जैसे लूटते हैं
दहेज के दाँव पर.

 

बेटा हूँ मैं
बहनों से अच्छा नहीं हूँ
ये पता है मुझे
पर इतना नकारा भी नहीं
जितना नकारा समझा है सबने मुझे
मेरे दर्द को भी कोई सुने, कुछ कहना चाहता हूँ मैं
पिताजी व्यस्त हैं, घर चलाने में
माँ व्यस्त है घर सम्भालने में
मैं किसी से कुछ नहीं कह पाता
पर मैं चाहता हूँ कोई मुझे भी समझे,
थोड़ी देर कोई मेरी बात भी सुने
बहनों के शादी की चिंता मुझे भी खूब सताती है
कई बार मेरी रातों की नींद भी उड़ जाती है
जब माँ के पसन्द की चीजें नहीं ला पाता हूँ
तो सच मानिए अपने जीवन को व्यर्थ पाता हूँ
पर ये दर्द मैं किसी से कह नहीं पाता हूँ,
पिताजी के जूते अब मेरे पैरों में आ जाते हैं
ख़ुश होने से ज़्यादा मैं छुप-छुप कर रोता हूँ
क्योंकि पिताजी के बराबर का हो गया हूँ मैं
पर फिर भी आज भी पिताजी हीं कमाने जाते हैं
मेरे दर्द को भी कोई सुने
अपने आप को सबसे हारा हुआ पाता हूँ मैं
कोई मेरा भी दर्द सुने, कुछ कहना चाहता हूँ मैं
बेटियों से कम नहीं हूँ मैं, जिम्मेदारियाँ निभाने में
बहनों का ख्याल रखने वाला प्यारा भाई हूँ मैं
माँ-पिता के कंधों के बोझ को कम करने वाला बेटा हूँ मैं
सबसे अलग… सबसे अनूठा हूँ मैं, क्योंकि बेटा हूँ मैं

ज़िन्दगी की धूप-छाँव
कभी गम, तो कभी खुशी है ज़िन्दगी
कभी धूप, तो कभी छाँव है ज़िन्दगी . . . . . . .
विधाता ने जो दिया, वो अद्भुत उपहार है ज़िन्दगी
कुदरत ने जो धरती पर बिखेरा वो प्यार है ज़िन्दगी . . . . . .
जिससे हर रोज नये-नये सबक मिलते हैं
यथार्थों का अनुभव कराने वाली ऐसी कड़ी है ज़िन्दगी . . . . . .
जिसे कोई न समझ सके ऐसी पहेली है ज़िन्दगी
कभी तन्हाइयों में हमारी सहेली है ज़िन्दगी . . . . . . .
अपने-अपने कर्मों के आधार पर मिलती है ये ज़िन्दगी
कभी सपनों की भीड़, तो कभी अकेली है जिंदगी . . . . . . .
जो समय के साथ बदलती रहे, वो संस्कृति है जिंदगी
खट्टी-मीठी यादों की स्मृति है ज़िन्दगी . . . . . . . .
कोई ना जान कर भी जान लेता है सबकुछ, ऐसी है ज़िन्दगी
तो किसी के लिए उलझी हुई पहेली है ज़िन्दगी . . . . . . . .
जो हर पल नदी की तरह बहती रहे ऐसी है जिंदगी
जो पल-पल चलती रहे, ऐसी है हीं ज़िन्दगी . . . . . . . .
कोई हर परिस्थिति में रो-रोकर गुजारता है ज़िन्दगी
तो किसी के लिए गम में भी मुस्कुराने का हौसला है ज़िन्दगी . . . . . .
कभी उगता सूरज, तो कभी अधेरी निशा है ज़िन्दगी
ईश्वर का दिया, माँ से मिला अनमोल उपहार है ज़िन्दगी . . . . . . . .
तो तुम यूँ हीं न बिताओ अपनी जिंदगी . . . . . . . .
दूसरों से हटकर तुम बनाओ अपनी जिंदगी
दुनिया की शोर में न खो जाए ये तेरी जिंदगी . . . . . . .
जिंदगी भी तुम्हें देखकर मुस्कुराए, तुम ऐसी बनाओ ये जिंदगी

 

बेटी है, तो है सृष्टि सारी
कभी बेटी, कभी बहन, कभी पत्नी, तो कभी माँ है नारी
पुरुष जिसके बिना असहाय है, ऐसी है नारी
कभी ममता की फुलवारी, तो कभी राखी की क्यारी है नारी
सृष्टि जिसके बिना थम जाए, ऐसी है नारी
पुरुषों की पूरी भीड़ पर अकेली भारी है नारी
जो सृष्टि को जलाकर राख कर दे, ऐसी चिंगारी है नारी
बेटी हो तो…….. पिता की राजदुलारी है नारी
माँ हो तो………. सन्तान पर हमेशा भारी है नारी
बहन हो तो……. भाई की लाडली है नारी
पत्नी हो तो…….. पति की जान है नारी
पुरुष हमेशा अधूरा तो…….. हमेशा पूरी है नारी
सृष्टि जिस पर घूम रही, वह धुरी है नारी
जब गर्भ में नहीं मरोगे, तभी तो तुम्हारी है नारी
जब नारी है………… तभी तो है ये सृष्टि सारी

 

बेटी बचाओ
मेरे होने का एहसास नहीं है।
पर वो दिन क्या ख़ास नहीं है।
जिस दिन मैं घर आई थी।
मम्मी तो मुस्कुराईं थी।
पापा भी चहक उठे थे।
पर फिर क्यों दुनिया ने नहीं दी बधाई थी।
लड़की हुई है ये सुनकर सबके मुह उतर गए।
बधाई देने वालो के शब्द क्यों तानो में बदल गए ।
लड़की हूँ मैं बोझ नहीं किस किस को समझाऊं मैं।
लड़को से हूँ कम नहीं क्यों तुमको बतलाऊ मैं।
भूल गए हो तुम सब शायद लड़की से है ये जग सारा।
तुम ना होते आज अगर माँ ने न होता तुमको 9 महीने कोख में पाला।
तो क्यों खुश नहीं होते हो तुम लड़की के होने पर ।
क्यों कुछ मासूमों को मार देते हो उनके होने पर।
उनका क्या कसूर उनको भेजा है इस जग में भगवान् ने।
तुम कोन होते हो, ये फैसला करने वाले के हम रहेंगे या नहीं इस संसार में।
लड़की से ही तुम भी हो , लड़की से है ये जग सारा।
कद्र करो और समानता लाओ। कहीं हो न जाए बंजर जग सारा।

 

बेटी
“वो पवित्र गीता की दोहा है”
बेटी सुख की संभावना है,
बेटी ईश्वर की आराधना है।
बेटी है तो ये सुन्दर सा जहां है,
बेटी नहीं तो मानव का अस्तित्व कहाँ है?
बेटी होगी तो, घर में पायल की छन-छन होगी,
बेटी होगी तो, घर में ख़ुशी से भरी कण-कण होगी।
बेटी पावन पूजा है,
बेटी के जैसा ना कोई दूजा है।
बेटी प्रयाग की पवित्र संगम है,
बेटी है, तो भरतनाट्यम है।
बेटी सबसे पूजनीय धर्म है,
जो हर वेदना सह ले, बेटी वो मर्म है।
बेटी है तो काजल, मेहँदी, बिंदिया और सिंदूर है,
बेटी नहीं, तो ये सारे श्रृंगार नहीं।
आज बेटी ने अपने हुनर से विश्व भर को मोहा है,
इक दिन गौर से उसे पढ़ना तुम, वो पवित्र “गीता” की दोहा है।

 

शिक्षा
अंधकार को दूर कर जो प्रकाश फैला दे
बुझी हुई आश में विश्वास जो जगा दे
जब लगे नामुमकिन कोई भी चीज
उसे मुमकिन बनाने की राह जो दिखा दे वो है शिक्षा
हो जो कोई असभ्य, उसे सभ्यता का पाठ पढ़ा दे..
अज्ञानी के मन में, जो ज्ञान का दीप जला दे..
हर दर्द की दवा जो बता दे.. वो है शिक्षा
वस्तु की सही उपयोगिता जो समझाए
दुर्गम मार्ग को सरल जो बनाए
चकाचौंध और वास्तविकता में अन्तर जो दिखाए
जो ना होगा शिक्षित समाज हमारा
मुश्किल हो जाएगा सबका गुजारा।।
इंसानियत और पशुता के बीच का अन्तर है शिक्षा..
शांति, सुकून और खुशियों का जन्तर है शिक्षा
भेदभाव, छुआछुत और अंधविश्वास दुर भगाने का मन्तर है शिक्षा
जहाँ भी जली शिक्षा की चिंगारी
नकारात्मकता वहाँ से हारी
जिस समाज में हों शिक्षित सभी नर-नारी
सफलता-समृद्धि खुद बने उनके पुजारी।।
इसलिए आओ शिक्षा का महत्व समझें हम
आओ पूरे मानव समाज को शिक्षित करें हम ||

 

ऐसी होती है माँ
हमारे हर मर्ज की दवा होती है माँ….
कभी डाँटती है हमें, तो कभी गले लगा लेती है माँ…..
हमारी आँखोँ के आंसू, अपनी आँखोँ मेँ समा लेती है माँ…..
अपने होठोँ की हँसी, हम पर लुटा देती है माँ……
हमारी खुशियोँ मेँ शामिल होकर, अपने गम भुला देती है माँ….
जब भी कभी ठोकर लगे, तो हमें तुरंत याद आती है माँ…..
दुनिया की तपिश में, हमें आँचल की शीतल छाया देती है माँ…..
खुद चाहे कितनी थकी हो, हमें देखकर अपनी थकान भूल जाती है माँ….
प्यार भरे हाथोँ से, हमेशा हमारी थकान मिटाती है माँ…..
बात जब भी हो लजीज खाने की, तो हमें याद आती है माँ……
रिश्तों को खूबसूरती से निभाना सिखाती है माँ…….
लब्जोँ मेँ जिसे बयाँ नहीँ किया जा सके ऐसी होती है माँ…….
भगवान भी जिसकी ममता के आगे झुक जाते हैँ

 

माँ मैं फिर
माँ मैं फिर जीना चाहता हूँ, तुम्हारा प्यारा बच्चा बनकर
माँ मैं फिर सोना चाहता हूँ, तुम्हारी लोरी सुनकर
माँ मैं फिर दुनिया की तपिश का सामना करना चाहता हूँ, तुम्हारे आँचल की छाया पाकर
माँ मैं फिर अपनी सारी चिंताएँ भूल जाना चाहता हूँ, तुम्हारी गोद में सिर रखकर
माँ मैं फिर अपनी भूख मिटाना चाहता हूँ, तुम्हारे हाथों की बनी सूखी रोटी खाकर
माँ मैं फिर चलना चाहता हूँ, तुम्हारी ऊँगली पकड़ कर
माँ मैं फिर जगना चाहता हूँ, तुम्हारे कदमों की आहट पाकर
माँ मैं फिर निर्भीक होना चाहता हूँ, तुम्हारा साथ पाकर
माँ मैं फिर सुखी होना चाहता हूँ, तुम्हारी दुआएँ पाकर
माँ मैं फिर अपनी गलतियाँ सुधारना चाहता हूँ, तुम्हारी चपत पाकर
माँ मैं फिर संवरना चाहता हूँ, तुम्हारा स्नेह पाकर
क्योंकि माँ मैंने तुम्हारे बिना खुद को अधूरा पाया है. मैंने तुम्हारी कमी महसूस की है .

 

जीवन एक संघर्ष
हर घड़ी, हर पहर, हर दिन, हर पल
दर्द में, खुशी में, नींद में, ख्वाब में
कश्मकश हैं कई, हल है कहीं नहीं
चल रहा हूँ मैं, मगर दौड़ है जिदंगी।
दोस्ती, दुश्मनी, रिश्तों की है ना कमी
अपनों में ही खुद को तलाशती जिदंगी
इस शहर से उस शहर, इस डगर से उस डगर
थक जाता हूँ मैं, मगर थकती नहीं है जिदंगी।
कल भी आज भी, आज भी कल भी
वही थी जिदंगी, वही है जिदंगी
रात क्या, दिन क्या, सुबह क्या, शाम क्या
सवाल थी जिदंगी, सवाल है जिदंगी।
जी भरकर खेलो यहाँ मगर संभलकर
बचपना भी जिदंगी, परिपक्वता भी जिदंगी
मनुज भी, पशु भी, खग भी, तरू भी
जिंदा है सब मगर मानवता है जिदंगी।
हम हैं, तुम हो, ये हैं, वो हैं
सब है यहाँ मगर कहाँ है जिदंगी
सोच है, साज है, पंख है, परवाज है
नाज है आज मगर कहाँ है जिदंगी।
कभी गम तो कभी खुशी के आंसू
वक्त के साथ परिवर्तन है जिंदगी
जिंदगी का लक्ष्य केवल है म्रत्यु मगर
मौत के बाद भी है कहीं जिदंगी।

 

स्वच्छ भारत / स्वच्छता अभियान
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
हम सबको ही मिल करके
सम्भव हर यत्न करके
बीडा़ यही उठाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
होगा जब ये भारत स्वच्छ
सब जन होंगे तभी स्वस्थ
सबको यही समझाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
गंगा माँ के जल को भी
यमुना माँ के जल को भी
मोती सा फिर चमकाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
आओ मिल कर करें संकल्प
होना मन में कोइ विकल्प
गन्दगी को दूर भगाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
देश को विकसित करने का
जग में उन्नति बढ़ाने का
नई नीति सदा बनाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
हम सबको ही मिल करके
हर बुराई को दूर करके
आतंकवाद को भी मिटाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
मानवता को दिल में रखके
धर्म का सदा आचरण करके
देश से कलह मिटाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है
सत्य अहिंसा न्याय को लाकर
सबके दिल में प्यार जगाकर
स्वर्ग को धरा पर लाना है
भारत को स्वच्छ बनाना है
भारत को ऊँचा उठाना है

 

स्कूल के दिनों
ना जाने हम कब बड़े हो गए ?
स्कूल के दिन न जाने कहाँ खो गए ?
दोस्तों की बातें जब भी याद आती है ।
आँखों में नमी सी छा जाती है ।
वो दोस्तों की गपसप, वो दोस्तों से लड़ना ।
टीचर के डाटने पर, छुप-छुप के हँसना ।
हर राह में दोस्तों का साथ निभाना ।
सही और गलत की पहचान कराना ।
वो अपना लंच छुपा कर खाना ।
वो दोस्तों का लंच झट से चट कर जाना ।
वो दोस्त के बीमार होने पर, उसको देखने जाना ।
वो उसका छुटा हुआ होमवर्क, खुद करके टीचर को दिखाना ।
कभी-कभी कोई बहाना बनाकर स्कूल न जाना |
और स्कूल जाते हीं छुट्टी होने की राह देखना |
कोई शरारत करके मासूम सा चेहरा बनाना |
सबसे छुपकर कक्षा में उत्पात मचाना |
कभी-कभी किसी दोस्त को मिलकर सताना |
अपने दोस्त के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाना |
दोस्तों के साथ हर दिन स्कूल आना-जाना |
कभी-कभी घर देर पहुँचने पर माँ की डांट खाना |
वो स्कूल के पल लौटकर ना आएंगे ।
हम बस उनको याद करके ही खुश हो जाएंगे ।

 

स्त्री
जिसका नहीं था कोई निश्चित ठिकाना,
आखिर तूने क्यों सोचा नारी को बनाना?
तूने सिखाया उसे दूसरों के लिए जीना, दूसरों के लिए मरना,
परंतु खुद के लिए नहीं कभी सोचना!
सच तो ये है कि स्त्री पुरूष दोनों ही हैं जग के आधार,
फिर क्यों समझा जाता है एक को बेकार?
जिसने दूसरों के लिए सब लुटाया,
उसे ही किसी ने न अपनाया!
कभी मायके में कहा पराई,
तो कभी ससुराल में पराये घर से आई!
सच कहूँ उपर वाले ये तेरी गलती नहीं है,
ये कुरीति तो इस पुरूषवादी समाज की उपज है!
अब तो लगता ही नहीं की नारी हैं हम,
क्योंकि एक वस्तु जैसी बना दी गई हैं हम!
जिसने जब चाहा जैसे चाहा हमारा उपयोग किया,
जी उब जाने पर……
चाय में गिरी मक्खी की तरह निकाल के फेंक दिया!
आखिर हमारे साथ ही ऐसा क्यूँ????
क्योंकि हम नारी हैं??

 

परियों के देश में
उड़ के चलूं आज मैं, एक ऐसे देश में,
मिलेंगी जहां खुशियां, परियों के भेष में
हर दर्द भूल जाउंगी, यूं ही खेल-खेल में
मिलेंगी जहां खुशियां, परियों के भेष में
देखा है एक सपना, सच करने जाउंगी
ख्वाबों की नगरी में, नए घर बसाउंगी
सच होंगें सारे सपने, बस सोच-सोच में
मिलेंगी जहां खुशियां, परियों के भेष में
मैं आसमां को खिड़कियों से, घर में लाउंगी
चंदा मामा को मैं, आइना बनाउंगी
सुरज-चांद-सितारे, खेले मेरे साथ-साथ में
मिलेंगी जहां खुशियां, परियों के भेष में
कागज पे लिपटी हुई, मेरी रात कह रही
सपनों के अध्याय, हर रोज खोल रही
कलम के दवात से, बुनूं ख्वाब-ख्वाब मैं
मिलेंगी जहां खुशियां, परियों के भेष में
प्यार की कश्ती में, सब झुमे नाचेंगें
खुशियों की लहरों में, हर गम भूल जाएंगें
खिलेंगें फूल प्यार के, हर डाल-डाल में
मिलेंगी जहां खुशियां, परियों के भेष में
सफलता की चादरों में, मैं लिपट जाउंगी
चूनर प्रसिद्धियों की, हर वक्त लहराउंगी
पहचानेंगें लोग मुझे, मेरे नाम-काम से
मिलेंगी जहां खुशियां, परियों के भेष में

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