लैंगिक असमानता से आप क्या समझते हैं? लैंगिक असमानता के कारण और लैंगिक असमानता कितने प्रकार की होती है।

लैंगिक असमानता

लैंगिक असमानता

पुलिंग और स्त्रीलिंग एक जैविक तथ्य है। यदि इस तथ्य के साथ किसी प्रकार की असमानता जोड़ दी जाती है तो यह एक सामाजिक तथ्य बन जाता है, जिसे लैंगिक असमानता कहा जाता है। अंग्रेजी के शब्द सेक्स (sex) और जेंडर (Gender) के लिए हिंदी में सत्य का ही प्रयोग होता है, जिसके कारण बहुधा इन्हें एक ही मान लिया जाता है। वास्तव में, दोनों में बहुत अंतर है।

आपने कभी अपने आस-पास या पड़ोस में बेटी के जन्म पर ढ़ोल नगाड़े या शहनाइयाँ बजते देखा है? शायद नहीं देखा होगा और देखा भी होगा तो कहीं इक्का-दुक्का| वस्तुतः हम भारत के लोग 21वीं शताब्दी के भारतीय होने पर गर्व करते हैं, बेटा पैदा होने पर खुशी का जश्न मनाते हैं और अगर एक बेटी का जन्म हो जाए तो शान्त हो जाते हैं।

लड़के के लिये इतना ज़्यादा प्यार कि लड़कों के जन्म की चाह में हम प्राचीन काल से ही लड़कियों को जन्म के समय या जन्म से पहले ही मारते आ रहे हैं, और अगर वो नहीं मारी जाती तो हम जीवन भर उनके साथ भेदभाव के अनेक तरीके ढूंढ लेते हैं। हम देवियों की पूजा तो करते हैं, पर महिलाओं का शोषण करते हैं। जहाँ तक महिलाओं के संबंध में हमारे दृष्टिकोण का सवाल है तो हमारा समाज दोहरे-मानकों का एक ऐसा समाज है जहाँ हमारे विचार और उपदेश हमारे कार्यों से भिन्न हैं।

लैंगिक असमानता का तात्पर्य लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव से है। पारंपरागत रूप से समाज में महिलाओं को कमज़ोर वर्ग के रूप में देखा जाता रहा है। वे घर और समाज दोनों जगहों पर शोषण, अपमान और भेद-भाव से पीड़ित होती हैं। महिलाओं के खिलाफ भेदभाव दुनिया में हर जगह प्रचलित है।

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लैंगिक असमानता के कारण

प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बे के अनुसार, “पितृसत्ता सामाजिक संरचना की ऐसी व्यवस्था हैं, जिसमें पुरुष, महिला पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है और उसका शोषण करता है” और भारतीय समाज में लिंग असमानता का मूल कारण इसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में निहित है।

  • महिलाओं का शोषण भारतीय समाज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परिघटना है। पितृसत्तात्मकव्यवस्था ने अपनी वैधता और स्वीकृति हमारे धार्मिक विश्वासों, चाहे वो हिन्दू, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म से ही क्यों न हों, सबसे प्राप्त की है।
  • समाज में महिलाओं की निम्न स्थिति होने के कुछ कारणों में अत्यधिक गरीबी और शिक्षा की कमी भी हैं। गरीबी और शिक्षा की कमी के कारण बहुत सी महिलाएँ कम वेतन पर घरेलू कार्य करने, वैश्यावृत्ति करने या प्रवासी मज़दूरों के रूप में कार्य करने के लिये मजबूर हो जाती हैं।
  • महिलाओं को न केवल असमान वेतन दिया जाता हैं, बल्कि उनके लिये कम कौशल की नौकरियाँ पेश की जाती हैं जिनका वेतनमान बहुत कम होता हैं। यह लिंग के आधार पर असमानता का एक प्रमुख रूप बन गया है।
  • लड़की को बचपन से शिक्षित करना अभी भी एक बुरा निवेश माना जाता हैं क्योंकि एक दिन उसकी शादी होगी और उसे पिता के घर को छोड़कर दूसरे घर जाना पड़ेगा। इसलिये, अच्छी शिक्षा के अभाव में अधिकांश महिलाएँ वर्तमान में नौकरी के लिये आवश्यक कौशल की शर्तों को पूरा करने में असक्षम हो जाती हैं।
  • महिलाओं को खाने के लिये वही मिलता है जो परिवार के पुरुषों के खाने के बाद बच जाता है। अतः समुचित और पौष्टिक भोजन के अभाव में महिलाएँ कई तरह के रोगों का शिकार हो जाती हैं।

Bharat ke Samajik Mudde in Hindi – Social Issues in India

लैंगिक असमानता के प्रकार

  1. मृत्यु दर असमानता: विश्व के अनेक क्षेत्रों में स्त्रियों और पुरुषों में असमानता का एक बर्बर प्रकार सामान्यतः स्त्रियों के उच्च मृत्यु दर में परिलक्षित होता है जिसके परिणाम स्वरुप कुछ जनसंख्या में पुरुषों की जनसंख्या अधिक हो जाती है।
  1. प्रासुतिक असमानता: गर्भ में ही बच्चे के लिंग को ज्ञात करने संबंधी आधुनिक तरीकों की उपलब्धता ने लैंगिक असमानता के इस रूप को जन्म दिया है। लिंग परीक्षण द्वारा यह पता लगाकर की होने वाले शिशु लड़की है तो उसका गर्भपात कर दिया जाता है।
  1. मौलिक सुविधा असमानता: मौलिक सुविधाओं की दृष्टि से भी अनेक देशों में पुरुषों और स्त्रियों में असमानता अस्पष्ट देखी जा सकती है। कुछ वर्ष पहले तक अफगानिस्तान में लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी थी। अतः ऐसे बहुत सारे मौलिक सुविधाओं के अभाव में स्त्रियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिल पाता।
  1. विशेष अवसर असमानता: यूरोप और अमेरिका जैसे अत्यधिक विकसित और अमीर देशों और ऐसे कई अन्य देशों में उच्च शिक्षा और व्यवसाय प्रशिक्षण में पक्षपात देखे जाते हैं।
  1. व्यवसायिक असमानता: व्यवसायिक असमानता भी लगभग सभी समाजों में पाई जाती है। जापान जैसे देश में, जहां जनसंख्या को उच्च शिक्षा प्राप्त करने और अन्य सभी प्रकार की मौलिक सुविधाएं उपलब्ध है, वहां पर भी रोजगार और व्यवसाय प्राप्त करने सरकार की मौलिक सुविधाएं औरतों को प्राप्त नहीं होती है।
  1. घरेलू असमानता: परिवार या घर के अंदर ही लैंगिक संबंधों में अनेक प्रकार की मौलिक असमानताएं पाई जाती है। घर की संपूर्ण देखरेख से लेकर के बच्चों के पालन पोषण का पूरा दायित्व स्त्रियों का होता है। अधिकांश देशों में पुरुष इन समूह में स्त्रियों की ही किसी प्रकार की सहायता नहीं करते हैं। अतः यह एक ऐसा काम का विभाजनहै जो स्त्रियों को पुरुषों के अधीन कर देता है।

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