भारत में महिलाओं पर घरेलू हिंसा के विरुद्ध और दहेज के विरुद्ध बनाए गए कानूनों का वर्णन कीजिए

घरेलू हिंसा एक साथी के साथ अंतरंग संबंध में डेटिंग, विवाह, सहवास या पारिवारिक संबंध जैसे दूसरे संबंधों का दुरुपयोग है। घरेलू हिंसा को घरेलू दुर्व्यवहार, पति-पत्नी के दुर्व्यवहार, पिटाई, पारिवारिक हिंसा, डेटिंग दुर्व्यवहार और अंतरंग साथी हिंसा के रूप में भी जाना जाता है।

घरेलू हिंसा

घरेलू हिंसा शारीरिक, भावनात्मक, मौखिक, आर्थिक और यौन शोषण हो सकती है। घरेलू हिंसा सूक्ष्म, जबरदस्ती या हिंसक हो सकती है। भारत में 70% महिलाएँ घरेलू हिंसा की शिकार हैं।

38% भारतीय पुरुष मानते हैं कि उन्होंने अपनी पत्नी का शारीरिक शोषण किया है। भारत सरकार ने घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 से महिलाओं की सुरक्षा जैसे कानून के माध्यम से घरेलू हिंसा को कम करने का प्रयास किया है।

भारत में महिलाओं पर घरेलू हिंसा के विरुद्ध और दहेज के विरुद्ध बनाए गए कानून

घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005

घरेलू हिंसा अधिनियम का निर्माण 2005 में किया गया और 26 अक्टूबर 2006 से इसे देश में लागू किया गया। इसका मकसद घरेलू रिश्तों में हिंसा झेल रहीं महिलाओं को तत्काल और आपातकालीन राहत पहुंचाना है। यह कानून महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाता है। केवल भारत में ही लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी रूप में इसकी शिकार हैं। यह भारत में पहला ऐसा कानून है जो महिलाओं को अपने घर में रहने का अधिकार देता है। घरेलू हिंसा विरोधी कानून के तहत पत्नी या फिर बिना विवाह किसी पुरुष के साथ रह रही महिला मारपीट, यौन शोषण, आर्थिक शोषण या फिर अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल की परिस्थिति में कार्रवाई कर सकती है।

  1. केंद्र और राज्य सरकार है जवाबदेह: यह कानून घरेलू हिंसा को रोकने के लिए केन्द्र व राज्य सरकार को जवाबदेह और जिम्मेदार ठहराता है। इस कानून के अनुसार महिला के साथ हुई घरेलू हिंसा के साक्ष्य प्रमाणित किया जाना जरूरी नहीं हैं। महिला के द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को ही आधार माना जाएगा क्योंकि अदालत का मानना है कि घर के अन्दर हिंसा के साक्ष्य मिलना मुश्किल होता है।
  1. महिला को मिलती है मदद: घरेलू हिंसा से पीडि़त कोई भी महिला अदालत में जज के समक्ष स्वयं या वकील, सेवा प्रदान करने वाली संस्था या संरक्षण अधिकारी की मदद से अपनी सुरक्षा के लिए बचावकारी आदेश ले सकती है। पीड़ित महिला के अलावा कोई भी पड़ोसी, परिवार का सदस्य, संस्थाएं या फिर खुद महिला की सहमति से अपने क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में शिकायत दर्ज कराकर बचावकारी आदेश हासिल कर सकती हैं। इस कानून का उल्लंघन होने की स्थिति में जेल के साथ-साथ जुर्माना भी हो सकता है।
  1. 60 दिन में होगा फैसला: लोगों में आम धारणा है कि मामला अदालत में जाने के बाद महीनों लटका रहता है, लेकिन अब नए कानून में मामला निपटाने की समय सीमा तय कर दी गई है। अब मामले का फैसला मैजिस्ट्रेट को साठ दिन के भीतर करना होगा।

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दहेज निषेध अधिनियम, 1961

दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा सम्पत्ति अथवा कीमती वस्तुओं के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है। धारा 406 के अन्तर्गत लड़की के पति और ससुराल वालों के लिए 3 साल की कैद अथवा जुर्माना या दोनों, यदि वे लड़की के स्त्रीधन को उसे सौंपने से मना करते हैं।

यदि किसी लड़की की विवाह के सात साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और यह साबित कर दिया जाता है कि मौत से पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी के अन्तर्गत लड़की के पति और रिश्तेदारों को कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।

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दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 के महत्वपूर्ण प्रावधान

दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 2 को दहेज़ (निषेध) अधिनियम संशोधन अधिनियम 1984 और 1986 के तौर पर संशोधित किया गया जिसमें दहेज़ को निम्न प्रकार से परिभाषित किया गया है:-

“दहेज़” का अर्थ है प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर दी गयी कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति सुरक्षा या उसे देने की सहमति”:-

  • विवाह के एक पक्ष के द्वारा विवाह के दूसरे पक्ष को; या
  • विवाह के किसी पक्ष के अभिभावकों द्वारा; या
  • विवाह के किसी पक्ष के किसी व्यक्ति के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को;
  • शादी के वक्त, या उससे पहले या उसके बाद कभी भी जो कि उपरोक्त पक्षों से संबंधित हो जिसमें मेहर की रकम सम्मिलित नहीं की जाती, अगर व्यक्ति पर मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) लागू होता हो।

इस प्रकार दहेज़ से संबंधित तीन स्थितियां हैं-

  1. विवाह से पूर्व;
  2. विवाह के अवसर पर;
  3. विवाह के बाद;

दहेज़ लेने और देने या दहेज लेने और देने के लिए उकसाने पर या तो 6 महीने का अधिकतम कारावास है या 5000 रूपये तक का जुर्माना अदा करना पड़ता है। वधु के माता-पिता या अभिभावकों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दहेज़ की मांग करने पर भी यही सजा दी जाती है। बाद में संशोधन अधिनियम के द्वारा इन सजाओं को भी बढाकर न्यूनतम 6 महीने और अधिकतम दस साल की कैद की सजा तय कर दी गयी है। वहीँ जुर्माने की रकम को बढ़ाकर 10,000 रूपये या ली गयी, दी गयी या मांगी गयी दहेज की रकम, दोनों में से जो भी अधिक हो, के बराबर कर दिया गया है। हालाँकि अदालत ने न्यूनतम सजा को कम करने का फैसला किया है लेकिन ऐसा करने के लिए अदालत को जरूरी और विशेष कारणों की आवश्यकता होती है (दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4)।

 दंडनीय है-
  • दहेज़ देना
  • दहेज़ लेना
  • दहेज़ लेने और देने के लिए उकसाना
  • वधु के माता-पिता या अभिभावकों से सीधे या परोक्ष तौर पर दहेज़ की मांग

(दहेज़ निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4)

निष्कर्ष: दहेज़ के लेन और देन के सम्बन्ध में सारे समझौते बेकार हैं और इन्हें कोई भी विधि अदालत लागू नहीं कर सकती है। वधु के अलावा अगर किसी व्यक्ति को दहेज़ मिलता है तो उसे वधु के खाते में तीन महीने के अन्दर रसीद समेत जमा करना होगा। अगर वधु नाबालिग है तो उसके बालिग़ होने के तीन महीने के अन्दर संपत्ति को हस्तांतरित करना होगा। अगर वधु की इस प्रकार के हस्तांतरण से पहले मृत्यु हो जाती है तो उसके उत्तराधिकारियों को उक्त समान शर्तों के तहत दहेज़ को हस्तांतरित करना होगा। ऐसा नहीं कर पाने की दशा में दहेज़ अधिनियम के तहत यह दंडनीय अपराध होगा और किसी भी सूरत में अदालत को नियत न्यूनतम सजा से कम दंड देने का अधिकार नहीं होगा।

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