भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों की विशेषता: भारतीय संविधान में शामिल मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) यह सुनिश्चित करने का एक तरीका है कि लोग देश में सभ्य जीवन जीते हैं। इन अधिकारों में कुछ अनोखी विशेषताएं हैं जो आमतौर पर अन्य देशों के संविधान में नहीं मिलती हैं। यह विशेषताएं निम्न प्रकार के हैं:-

संविधान

1. राष्ट्रीय आंदोलन के भावना के अनुकुल – भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के समय भारतीय नेताओं ने अंग्रेजों के समझ बार-बार अपने अधिकारों की मांग रखी थी स्वतंत्रता के पश्चात् सौभाग्यवश भारतीय संविधान सभा के लिये राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बहुमत में निर्वाचित हुए थे जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के समय की अपनी पुरानी मांग को भारतीय संविधान में सर्वोपरी प्राथमिकता देते हुए मौलिक अधिकारों की व्यवस्था की।

2. सर्वाधिक विस्तृत एवं व्यापक अधिकार – भारतीय संविधान के तृतीय भाग में अनुच्छेद 12 से 30 और 32 से 35 तक मौलिक अधिकारों का वर्णन है। जो अन्य देशों के संविधानों में किये गये वर्णन की तुलना में सर्वाधिक है।

3. व्यावहारिकता पर आधारित – भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के सिद्धांत न होकर व्यावहारिक और वास्तविकता पर आधारित है। किसी भेदभाव के बिना समानता के आधार पर सभी नागरिकों के लिए इनकी व्यवस्था की गयी है। साथ ही अल्पसंख्याकों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं पिछड़ा वगोर्ं की उन्नति एवं विकास के लिए विशेष व्यवस्था भी की गयी है।

4. अधिकारों के दो रूप – मौलिक अधिकारों के सकारात्मक एवं नकारात्मक दो रूप है। सकारात्मक स्वरूप में व्यक्ति को विशिष्ठ अधिकार प्राप्त होते हैं। स्वतंत्रता धर्म शिक्षा और संस्कृति आदि से संबंधित अधिकारों को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। इस प्रकार सकारात्मक अधिकार सीमित एवं मर्यदित है। नकारात्मक स्वरूप में वे अधिकार आते हैं जो निसेधाज्ञाओं के रूप में है और राज्य की शक्तियों को सीमित एवं मर्यदित करते हैं। इस प्रकार नकारात्मक अधिकार असीमित है।

5. मौलिक अधिकार असीमित नहीं – भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिये गये मौलिक अधिकार असीमित नहीं है। इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सामाजिक हित में सीमित करने की व्यवस्था की गयी। लोक कल्याण, प्रशासनिक कुशलता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध भी लगाये जा सकते है। संसद ने सन् 1979 में 44 वें संविधान द्वारा संपत्ति के मौलिक अधिकार को लेकर केवल एक कानूनी अधिकर बना दिया है।

6. सरकार की निरंकुशतापर अंकुश – मौलिक अधिकार प्रत्येक भारतीय नागरिक की स्वतंत्रता के द्योतक और उसकी भारतीय नागरिकता के परिचायक हैं। संविधान द्वारा इनके उपयोग का पूर्ण आश्वासन दिया गया है। अत: किसी भी स्तर की भारत सरकार मनमानी करते हुए उन पर अनुचित रूप से प्रतिबंध नहीं लगा सरकार, जिला-परिषद्, नगर निगम या ग्राम पंचायतें आदि समस्त निकाय मौलिक अधिकारों का उल्लंधन नहीं कर सकतीं।

7. राज्य के सामान्य कानूनों से ऊपर – मौलिक अधिकार को देश के सर्वोच्च कानून अर्थात् संविधान में स्थान दिया गया है और साधारणतया संविधान संशोधन प्रक्रिया के अतिरिक्त इनमें और किसी प्रकार से परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इस प्रकार मौलिक अधिकार संसद और राज्य-विधानमण्डलों द्वारा बनाये गये कानूनों से ऊपर है।

8. न्यायालय द्वारा संरक्षण – मौलिक अधिकार पूर्णतया वैधानिक अधिकार हैं। संविधान की व्यवस्था के अनुसार मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए भारतीय न्यायपालिका को अधिकृत किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 32 के अनुसार, भारत का प्रत्येक नागरिक अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए उच्च न्यायालयों या सार्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकता है।

9. भारतीय नागरिकों तथा विदेशियों में अंतर – भारतीय नागरिकों तथा भारत में निवास करने वाले विदेशी नागरिकों के लिए संविधान द्वारा दिये गये मौलिक अधिकारों में अंतर है। मौलिक अधिकारों में कुछ अधिकार ऐसे हैं, जो भारतीयों के साथ-साथ विदेशियों को भी प्राप्त हैं, जैसे- जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, परन्तु शेष अधिकार केवल भारतीय नागरिकों के लिए ही सुरक्षित हैं। इस प्रकार भारतीय नागरिको को प्राप्त समस्त मौलिक अधिकारों का उपभोग विदेशी नागरिक नहीं कर सकते।

निष्कर्ष:  नागरिकों के जीवन में मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये अधिकार जटिलता और कठिनाई के समय बचाव कर सकते हैं और हमें एक अच्छे इंसान बनने में मदद कर सकते हैं।

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भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्यों की व्याख्या

भारतीय संविधान में मूल कर्तव्यों को रूस के संविधान से प्रभावित होकर लिया गया हैं “। भारतीय संविधान के भाग – 4A में अनु०-51A के अंतर्गत नागरिकों हेतु मौलिक कर्तव्यों का वर्णन किया गया है। भारतीय संविधान में मौलिक  कर्तव्यों के लिए कोई व्याख्या नहीं थी। इसे 42 वें संविधान संसोधन अधिनियम 1976 के द्वारा संविधान के भाग – 4A के तहत अनु० – 51A जोड़ा गया। 86 वें संविधान संसोधन अधिनियम 2002 द्वारा मूल कर्तव्यों में पुन: एक मूल कर्तव्य जोड़ा गया जिससे कुल 11 मूल कर्तव्य हो गए।

मूल कर्तव्यों की सिफारिश

1976 में कांग्रेस पार्टी ने सरदार स्वर्ण सिंह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। जिसे राष्ट्रीय आपातकाल (1975-77) समय इस संबंध में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी। इसके द्वारा संविधान में 8 मूल कर्तव्यों को जोड़ा गया:-

  1. संविधान का पालन व उसके आदर्शो , संस्थाओं , राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का सम्मान करे।
  2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शो को ह्रदय में संजोए रखे व उनका पालन करे।
  3. भारत की संप्रभुता , एकता और अखंडता की रक्षा करे ।
  4. राष्ट्र की रक्षा करे और आवाहन किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे।
  5. भारत के सभी लोगो में समरसता और भ्रातृत्व की भावना को जागृत रखे।
  6. हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे।
  7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे।
  8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण , मानववाद , ज्ञानार्जन की भावना जागृत करे।
  9. सार्वजनिक संपति की सुरक्षा करे और हिंसा से दूर रहे।
  10. व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधयों के लिए सतत् प्रयास करते रहे।
  11. 6 – 14 वर्ष तक की आयु के बच्चो को नि:शुल्क शिक्षा का अवसर उपलब्ध कराना।

सरदार स्वर्ण समिति की सिफारिशों र 8 मूल कर्तव्य जोड़े गए थे, किंतु 42 वें संविधान संसोधन अधिनियम 1976  द्वारा इसमें 2 और मूल   कर्तव्य जोड़े गए। 86 वें संविधान संसोधन अधिनियम 2002 के द्वारा इसमें 11 वां मूल कर्तव्य भी जोड़ा गया।

मूल कर्तव्यों का महत्व

  • मूल कर्तव्यों को भी नीति निदेशक तत्वों की भांति संविधान की व्याख्या हेतु उपयोग किया गया है।
  • विधायिका द्वारा विधि निर्माण करते समय इनके क्रियान्वयन को आधार बनाया जा सकता है तथा कार्यो का औचित्य सिद्ध करने के लिए इन कर्तव्यों का सहारा लिया गया है ।
  • संविधान के मूल कर्तव्यों की स्थापना से अधिकारों व मूल कर्तव्यों की स्थापना से मूल्यों से स्वस्थ संतुलन स्थापित है।
  • मूल कर्तव्य व्यक्ति के सामाजिक दायित्व की भावना का संचार करते है अत: जिससे राष्ट्रीय भावना में वृद्धि होती है ।
  • ए कर्तव्य भारतीय संस्कृति के अनुकूल है और ये कर्तव्य भारतीय जनता में बंधुत्व की भावना बढ़ाते है।

वर्मा समिति रिपोर्ट – 1999: वर्मा समिति की रिपोर्ट के अनुसार कुछ मूल कर्तव्यों का अनुपालन करने हेतु पहले से ही कुछ वैधानिक प्रावधान है। जैसे –

  • राष्ट्रध्वज , भारतीय संविधान व राष्ट्रगान के प्रति कोई अवमानना न प्रदर्शित कर उसका सम्मान किया जाए।
  • भेदभाव, जाति अथवा धर्म व अन्य किसी आधार पर भेदभाव वर्जित है।
  • राष्ट्रीय एकता को हानि पहुंचाने वाले कार्य IPC की धारा के तहत दंडनीय है।
  • धर्म से जुडी आक्रामक गतिविधियाँ IPC की धारा के अंतर्गत आती है ।

 मूल कर्तव्यों की आलोचना

  • मूल कर्तव्य ना तो बाध्यकारी है और न ही इनका हनन होने पर न्यायालय जाया जा सकता है।
  • कुछ मूल कर्तव्यों का दोहराव है , जैसे – संप्रभुता , एकता और अखंडता की रक्षा करे ।
  • मूल कर्तव्यों में मतदान , कर अदायगी , परिवार नियोजन आदि समाहित नहीं है।
  • कुछ मूल कर्तव्यों की भाषा जटिल है , जैसे – उच्च आदर्श , वैज्ञानिक दृष्टिकोण आदि।

भारतीय सविधान के निर्माण के विभिन्न चरण और प्रमुख विशेषताओं का परिचय

निष्कर्ष: भारत के संविधान में मौलिक कर्तव्यों को सम्मिलित करने का विचार पूर्वी सोवियत संघ (USSR) के संविधान से प्रेरित है। मूलभूत कर्तव्यों का पालन करने के लिए न्यायालय किसी नागरिक को बाध्य नहीं कर सकता। हालांकि, हर नागरिक को मौलिक कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

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