बेरोजगारी को परिभाषित कीजिए और बेरोजगारी के कारणों पर विस्तृत प्रकाश डालिए।

बेरोजगारी की परिभाषा

जब देश में कार्य करनेवाली जनशक्ति अधिक होती है किंतु काम करने के लिए राजी होते हुए भी बहुतों को प्रचलित मजदूरी पर कार्य नहीं मिलता, तो उस विशेष अवस्था को ‘बेरोजगारी’ (Unemployment) की संज्ञा दी जाती है।

बेरोजगारी उस सिथति को दर्शाती है जिसमें श्रमिककामगार कार्य करने के लिये योग्य तथा तत्पर है लेकिन उसे रोजगार नहीं मिलता है। दूसरे शब्दों में, Berojgari वह सिथति है जहाँ व्यकित कार्य करने के लिये योग्य तथा तत्पर होते हुए भी वह काम पाने में असफल रहता है, जो उसे आम या आजीविका प्रदान करता है।

बेरोजगारी

बेरोजगारी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो द्वारा उन लोगों के रूप में परिभाषित की गई है जिनकी नौकरी नहीं है, पिछले चार हफ्तों में सक्रिय रूप से काम करने की तलाश में हैं और वर्तमान में काम के लिए उपलब्ध हैं। इसके अलावा, जो लोग अस्थायी रूप से बंद थे और उस नौकरी पर वापस बुलाए जाने के इंतजार में थे, वे berojgari के आंकड़ों में शामिल हैं।

बेरोजगारी के कारण

भारत में बेरोजगारी की समस्या ने स्वतंत्राता के समय से ही चौंकाने वाले हालात अखितयार कर लिया है। ऐसे कर्इ घटक हैं जिनकी berojgari को बढ़ाने में उनकी प्रमुख भूमिका होती है, कुछ घटकों का निम्न प्रकार से वर्णन किया है- 

  1. उच्च जनसंख्या दर:-पिछले कुछ दशको से देश की तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या ने बेरोजगारी की समस्या को तेजी से (उग्ररुप से) बढ़ाया है। देश की तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण प्रत्येक योजनाकाल में बेरोजगारी के परिमाण में वृद्धि हुई है, जिससे एक भयानक (खतरनाक) सिथति उत्पन्न हो गर्इ। भारत के आर्थिक विकास की अपेक्षा जनसंख्या की वृद्धि दर अधिक रही है। इस प्रकार आर्थिक विकास के होते हुए भी अद्र्धशती में बेरोजगारी की समस्या भयानक रूप से बढ़ी है।
  1. आर्थिक विकास की अपर्याप्त दर –यधपि भारत एक विकासशील देश है, लेकिन देश की सम्पूर्ण श्रम-शकित को अवशोषित (खपाने में) करने में वृद्धि दर अपर्याप्त है। देश की अतिरिक्त श्रम शकित को समायोजित करने में रोजगार के अवसर अपर्याप्त हैं, परिणास्वरूप देश की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई है।
  1. कृषि के अलावा अन्य क्रियाओं में रोजगार के अवसरों का अभाव –देश के अन्य क्षेत्राों की अपेक्षा रोजगार उपलब्ध कराने में कृषि क्षेत्रा की प्रमुख भूमिका रही है। ग्रामीण बेरोजगारी का प्रमुख कारण कृषि की निम्न विकास दर है। चूँकि जनसंख्या का लगभग 2/3 भाग कृषि कार्य में संलग्न है जिस कारण भूमि पर जनसंख्या का दबाव अधिक है। अत% श्रम शकित का एक भाग छिपी बेरोजगारी से ग्रसित है।
  1. मौसमी रोजगार –भारत में कृषि मौसमी रोजगार उपलब्ध कराती है। अत% जब कृषि कार्य नहीं किया जाता है तब किसान बेरोजगार हो जाता है।
  1. संयुक्त परिवार प्रणाली –भारत में संयुक्त परिवार प्रणाली छिपी-बेरोजगारी को बढ़ावा देती है। सामान्यत% परिवार के सदस्य परिवार के खेतों मेंपारिवारिक धन्धों में संलग्न होते हैं। इन आर्थिक क्रियाओं (धन्धों) में आवश्यकता से अधिक परिवार के सदस्य निहित (संलग्न) होते हैं।
  1. भारतीय विश्वविधालयों से बढ़ती हुर्इ स्नाताको की संख्या –पिछले दशक के दौरान भारतीय विश्वविधालयों से स्नातकों की संख्या में वृ)ि ने शैक्षणिक बेरोजगारी को बढ़ाया है। भारतीय शैक्षणिक प्रणाली में कला विषयों की अपेक्षा तकनीकी तथा अभियंता (इंजीनियरिग) क्षेत्रा में अधिक प्रतिस्थापन पर जोर दिया जा रहा है लेकिन तकनीकी स्नातकों के मèय भी बेरोजगारी विधमान है।
  1. उधोगों का धीमा विकास –देश में औधौगिकीकरण तीव्र नहीं है तथा औधोगिक श्रमिकों को रोजगार के अवसर अल्प है। औधोगिक क्षेत्रा अतिरिक्त कृषि श्रम (कामगारों) को समायोजित (खपा) नहीं पाता है। जो कृषि क्षेत्रा में छिपी बेरोजगारी को बढ़ावा देते हैं।
  1. अनुपयुक्त तकनीक –शहरी औधोगिक क्षेत्रा में बेरोजगारी का एक प्रमुख कारण अनुपयुक्त तकनीकों का प्रयोग है। देश में प्रचुर मात्राा में मौजूद श्रम शकित का आवश्यकता के अनुसार प्रयोग के बजाय उच्च पूँजी-गहन तकनीक का प्रयोग करते हैं जो श्रम के प्रयोग को न्यूनतम करता है। इस प्रकार की तकनीक का प्रयोग भारत के लिए अनुपयुक्त है, जो अधिक श्रम शकित को समायोजित करने की अपेक्षा बेरोजगारी को बढ़ावा देती है।

भारत में बेरोजगारी की समस्या को हल करने के उपाय

पंचवर्षीय योजनाओं का अध्यन से पता चलता है कि प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में विकास के उद्देश्य के रूप में रोजगार विस्तार पर जोर दिया गया है। सभी योजना घोषणाओं के बावजूद, बेरोजगारी पर काबू नही पाया गया है। हमारे देश में बेरोजगारी की समस्या को हल करने के लिए निम्नलिखित उपाय किये जाया सकते हैं:-

1. शिक्षा नीति का पुनर्गठन

हमारी शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा दोष यह है कि यह किसी को केवल व्यावसायिक डिग्री लेने के लिए प्रेरित करती है। शिक्षितों में बेरोजगारी की उच्च डिग्री हमारी शिक्षा प्रणाली को अधिक से अधिक रोजगार के अवसरों को पुन: पेश करने की तत्काल आवश्यकता को दर्शाती है। शिक्षा प्रणाली को और अधिक विविध किया जाना चाहिए। इसमें अधिक अल्पावधि के व्यावसायिक पाठ्यक्रम होने चाहिए जो स्थानीय रोजगार की जरूरतों को पूरा करेंगे। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विकास राष्ट्र के विकास के लिए एक शर्त है क्योंकि यह देश में बेरोजगारी की समस्या सहित सभी समस्याओं का समाधान है। इसलिए, सार्वजनिक व्यय में शिक्षा के लिए एक उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

2. ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी

N.S.S. आंकड़ों से भारत में उच्च स्तर की बेरोजगारी के अस्तित्व का पता चला है। उपलब्ध बेरोजगारों की कुल संख्या और अतिरिक्त काम करने के इच्छुक दो करोड़ से अधिक होने का अनुमान है। ग्रामीण कार्यक्रम का आयोजन करना आवश्यक है। ग्रामीण कार्य कार्यक्रम के कार्यान्वयन में विफलता लाखों भूमिहीन मजदूरों और छोटे सीमांत किसानों को अतिरिक्त रोजगार प्रदान करने के लिए ग्रामीण क्षेत्र को दिए गए अपेक्षाकृत कम महत्व को रेखांकित करती है। इस दिशा में तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में काम के अवसर बढ़ें। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में आय और रोजगार का स्तर बढ़ेगा और गरीबी के स्तर में कमी आएगी।

3. छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में नए विकास केंद्रों को प्रोत्साहित करना

नियोजन के अनुभव से पता चला है कि भीड़भाड़ वाले महानगरीय केंद्रों को निवेश का एक बड़ा हिस्सा मिला है। इसलिए, छोटे शहरों को भविष्य के लिए नए विकास केंद्रों के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। छोटे औद्योगिक परिसरों की स्थापना से रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं और अर्थव्यवस्था को लचीलापन प्रदान किया जा सकता है।

4. बड़े उद्यमों के मुकाबले छोटे उद्यमों को प्रोत्साहन

यदि बड़े उद्यमों के बजाय छोटे उद्यमों को अधिक निवेश का निर्देश दिया जाए तो रोजगार का उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है। अब जब सरकार छोटे स्तर के उद्यमों पर जोर देने के साथ विकेंद्रीकृत विकास करना चाहती है, तो क्रेडिट, लाइसेंसिंग, कच्चे माल के आवंटन और अन्य नीतियों को इस तरह से पुनर्व्यवस्थित करना होगा कि दोनों रोजगार एक साथ बढ़े।

5. तकनीक चुनने की समस्या

बेहतर होगा कि जब तक औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया को एक शक्तिशाली गति न मिल जाए, तब तक इंटरमीडिएट प्रौद्योगिकियों पर स्विच करना बेहतर होगा, ताकि श्रम बल के नए प्रवेशकों को अवशोषित किया जा सके। श्रम बल में तेजी से वृद्धि की अवधि के दौरान, रोजगार के उद्देश्य के अनुरूप तकनीकों की choice को समायोजित करना उचित होगा। इंटरमीडिएट तकनीक भारतीय परिस्थितियों के लिए अधिक अनुकूल होगी।

6. रोजगार के आधार पर सब्सिडी

बड़े और छोटे उद्योगों को सब्सिडी और प्रोत्साहन की सभी योजनाओं ने पूंजी संसाधनों का अधिकतम उपयोग करने में मदद की है। सब्सिडी के पैटर्न में बदलाव किया जाना चाहिए। प्रोत्साहन के अनुदान के आधार के रूप में अधिक रोजगार का सृजन किया जाना चाहिए। यह बड़े पैमाने पर निर्माता से छोटे पैमाने पर निर्माता को सरकारी समर्थन के पूरे ढांचे को स्थानांतरित कर देगा क्योंकि यह रोजगार सृजन के उद्देश्य और समानता और सामाजिक न्याय प्राप्त करने के साथ अधिक सुसंगत है।

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निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि उपरोक्त सभी उपाय उस समय तक विफल रहेंगे जब तक कि हम नये रोजगार प्राप्त करने वाली श्रम-शक्ति मात्रा को नियन्त्रित नहीं करते और इसके लिए अति आवश्यक है कि जनसख्या वृद्धि को नियन्त्रित किया जाये।

जब तक जनसंख्या वृद्धी नियंत्रित नहीं किया जा सकता तब तक कोई भी नीति बेरोजगारी को दूर करने में सफल नहीं हो सकती। अत: हम सभी को जनसंख्या विस्फोट की बढती हुई बाद को रोकने हेतु सेतु बनाना अति आवश्यक है।

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