भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना : East India Company एक निजी व्यापारिक कम्पनी थी, जिसने 1600ई. में शाही अधिकार पत्र द्वारा व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। इसकी स्थापना 1600 ई. के अन्तिम दिन महारानी एलिजाबेथ प्रथम के एक घोषणापत्र द्वारा हुई थी। यह लन्दन के व्यापारियों की कम्पनी थी, जिसे पूर्व में व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया गया था। कम्पनी का मुख्य उद्देश्य धन कमाना था। 1708 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी  की प्रतिद्वन्दी कम्पनी ‘न्यू कम्पनी’ का ‘ ईस्ट इंडिया कंपनी ‘ में विलय हो गया। परिणामस्वरूप ‘द यूनाइटेड कम्पनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग टू ईस्ट इंडीज’ की स्थापना हुई। कम्पनी और उसके व्यापार की देख-रेख ‘गर्वनर-इन-काउन्सिल’ करती थी।

ईस्ट इंडिया कंपनी

1. ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत आगमन:

1608 ई. में कम्पनी का पहला व्यापारिक पोत सूरत पहुँचा, क्योंकि कम्पनी अपने व्यापार की शुरुआत मसालों के व्यापारी के रूप में करना चाहती थी।

2. व्यापार के लिए संघर्ष:

कम्पनी ने सबसे पहले व्यापार की शुरुआत मसाले वाले द्वीपों से की। 1608 ई. में उसका पहला व्यापारिक पोत सूरत पहुँचा, परन्तु पुर्तग़ालियों के प्रतिरोध और शत्रुतापूर्ण रवैये ने कम्पनी को भारत के साथ सहज ही व्यापार शुरू नहीं करने दिया। पुर्तग़ालियों से निपटने के लिए अंग्रेज़ों को डच ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायता और समर्थन मिला और दोनों कम्पनियों ने एक साथ मिलकर पुर्तग़ालियों से लम्बे अरसे तक जमकर तगड़ा मोर्चा लिया।

3. ईस्ट इंडिया कंपनी की सफलताएँ:

1615-18 ई. में सम्राट जहाँगीर के समय ब्रिटिश नरेश जेम्स प्रथम के राजदूत सर टामस रो ने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए कुछ विशेषाधिकार प्राप्त कर लिये। इसके शीघ्र बाद ही कम्पनी ने मसुलीपट्टम और बंगाल की खाड़ी स्थित अरमा गाँव नामक स्थानों पर कारख़ानें स्थापित किये। किन्तु कम्पनी को पहली महत्त्वपूर्ण सफलता मार्च, 1640 ई. में मिली, जब उसने विजयनगर शासकों के प्रतिनिधि चन्द्रगिरि के राजा से आधुनिक चेन्नई नगर का स्थान प्राप्त कर लिया। जहाँ पर उन्होंने शीघ्र ही सेण्ट जार्ज क़िले का निर्माण किया।

4. कोलकाता नगर की स्थापना:

1687 ई. में कम्पनी के एक वफ़ादार सेवक जॉब चारनाक ने बंगाल के नवाब इब्राहीम ख़ाँ के निमंत्रण पर भागीरथी की दलदली भूमि पर स्थित सूतानाती गाँव में कलकत्ता नगर की स्थापना की। बाद को 1698 ई. में सूतानाती से लगे हुए दो गाँवों, कालिकाता और गोविन्दपुर, को भी इसमें जोड़ दिया गया। इस प्रकार पुर्तग़ालियों के ज़बर्दस्त प्रतिरोध पर विजय प्राप्त करने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी  ने 90 वर्षों के अन्दर तीन अति उत्तम बन्दरग़ाहों-बम्बई, मद्रास और कलकत्ता पर अपना अधिकार कर लिया। इन तीनों बन्दरग़ाहों पर क़िले भी थे। ये तीनों बन्दरग़ाह प्रेसीडेंसी कहलाये और इनमें से प्रत्येक का प्रशासन East India Company के ‘कोर्ट ऑफ़ प्रोपराइटर्स’ द्वारा नियुक्त एक गवर्नर के सुपुर्द किया गया। ईस्ट इंडिया कंपनी का संचालन लन्दन में ‘लीडल हॉल स्ट्रीट’ स्थित कार्यालय से होता था।

5. ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत पर प्रभुसत्ता:

व्यापार में ईस्ट इंडिया कंपनी के इस एकाधिकार का कई अंग्रेज़ व्यापारियों ने विरोध किया और सत्रहवीं शताब्दी के अन्त में ‘दि इण्डियन कम्पनी ट्रेडिंग टु दि ईस्ट इण्डीज़’ नामक एक प्रतिद्वन्द्वी संस्था की स्थापना की। नयी और पुरानी दोनों कम्पनियों में कड़ी प्रतिद्वन्द्विता चल पड़ी, जिसमें पुरानी कम्पनी के पैर उखड़ने लगे, किन्तु भारत और इंग्लैण्ड दोनों ही जगह अत्यन्त कटु और अप्रतिष्ठाजनक प्रतिद्वन्द्विता के बाद 1708 ई. में समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत दोनों को मिलाकर एक कम्पनी बना दी गई और उसका नाम रखा गया ‘दि यूनाइडेट कम्पनी ऑफ़ दि मर्चेण्ट्स ऑफ़ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग टू दि ईस्ट इण्डीज़’। यह संयुक्त कम्पनी बाद में East India Company के नाम से ही मशहूर रही और डेढ़ सौ वर्षों में वह मात्र एक व्यापारिक निगम न रहकर एक ऐसी राजनीतिक एवं सैनिक संस्था बन गई, जिसने सम्पूर्ण भारत पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर ली।

भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों की विशेषता और मौलिक कर्तव्यों की व्याख्या

अतः यह कंपनी अपने व्यापार करने के तरीके के लिए विख्यात रही, किन्तु इससे भी ज्यादा इसको तब जाना जाने लगा, जब इसने भारत पर अपना कदम रखा और एक लंबे समय तक यहां व्यापार किया। मुगलों पर जिस तरह से अपनी पकड़ को मजबूत करते हुए इसने भारत में अपना विस्तार किया, उसे भुलाया नहीं जा सकता।

मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्वों के बीच अन्तर पर प्रकाश डालिए

भारत में East India Company की और अधिक जानकारी के लिए आप विकिपीडिया का यह पोस्ट भी पढ़ सकते हैं. अगर आपको हमारा यह पोस्ट ” भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी ” अच्छा लगा तो सोशल मीडिया पर Share जरूर करें.

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